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भगत सिंह

भगत सिह को मानने  वालो गाँधी को अपनाने वालो दिल्ली के दरबारी हो सब कलयुग के अवतारी हो तुम क्या जानो बलिदान भगत सिह गाँधी के मूल्यों में समाहित जीवन की जो धार निरन्तर सीमा पर हर वार निरन्तर तुम वोट गिनों लाशों से सने जात पात और धर्म लडाकर तुम क्या जानो बसुधैव कुटुम्ब तुम पीड देश पहचान क्या पाये

भूगोल की घटती प्राथमिकता और इसे पुनर्जीवित करने की आवश्यकता

  भूगोल की घटती प्राथमिकता और इसे पुनर्जीवित करने की आवश्यकता यदि किसी विषय ने उच्च शिक्षा और व्यावसायिक करियर में अपनी प्राथमिकता खो दी है, तो उनमें भूगोल प्रमुख रूप से शामिल है। स्कूल और विश्वविद्यालयों में छात्रों की भूगोल विषय में घटती रुचि यह दर्शाती है कि यह विषय अपने मौलिक स्वरूप को खोता जा रहा है। ऐसे में, यह आवश्यक है कि शैक्षिक संस्थान, पाठ्यक्रम निर्माताओं और नीति-निर्धारकों को गहराई से विचार करना चाहिए कि भूगोल का स्वरूप किस प्रकार विकसित हो रहा है और इसे पढ़ाने के प्रभावी तरीके क्या हो सकते हैं। भूगोल का वास्तविक स्वरूप दो मुख्य शाखाओं में विभाजित किया जा सकता है:  भौतिक भूगोल (Physical Geography) और मानव भूगोल (Human Geography) । मानव भूगोल में सांस्कृतिक भूगोल, आर्थिक भूगोल, स्वास्थ्य भूगोल, ऐतिहासिक भूगोल, राजनीतिक भूगोल, जनसंख्या भूगोल, ग्रामीण भूगोल, सामाजिक भूगोल और परिवहन भूगोल जैसी शाखाएँ शामिल हैं। वहीं, भौतिक भूगोल में भूआकृति विज्ञान (पृथ्वी की सतह के अध्ययन), जलवायु विज्ञान (जलवायु प्रणालियों का अध्ययन), जैव भूगोल (प्रजातियों के वितरण का अध्ययन), जल वि...

राहें तब भी

कभी कोई विरहन पूछेगी कभी बहस कोई सड़क चलेगी धी में सनी कोई गुदगुदी रोटी पालक संग कोई चाय तकेगी रंग लगी पुरखों की  हवेली  नल की टोंटी सूखी होगी शक सूबा सवाल कभी सब कभी शहर में आँधी होगी मिजाज कभी बदले से होंगें कभी प्रश्नों की झडी सी होगी कविता तब भी शब्द तकेगी डोर सांस अटकी सी होगी तब भी जब सब नल सूखेंगें तब भी जब सब सडक नपेंगी तब भी जब घनघोर अन्धेरा राहे तब भी ढूंढ में होंगी 

कब

लिखा हुआ जो विधि का है फलिभूत कब कर्मो से जीवन के सघर्षों से कब मन की आपाधापी से बोने समर्पण विश्वासों के कब जीत भरोसा पाये हैं कब शब्दों के बाणों ने  मार्ग प्रशस्त करवायें हैं  प्रयत्नों के प्रयासों से सुधी हुई ना तृप्ति हुई कब प्रमाणों के परिणामों से सुभगता की जीत हुई कुछ थोडा सा कर जाना है कुछ सिद्ध नही कर जाना है कब अहसानों के धागों से स्नेह प्रीत से गुथी रही

बंजर जमीं

 सूखे ठूँठ पर आखिरी कोपल  अस्थि चिता में खाक सी   भंडार में  बीज मृतक  वजूद की एक लड़ाई सी  तमन्नाओं के आसमान पर  एकटक बंजर जमीं सी  रेत पर गोते खाती आस की एक उम्मीद सी  अभिमन्यु सा जीवन  कर्ण की पहचान सी   महाभारत का रण लड़ती  बर्बरिक की आँखें सी 

समय का सफर

सफर में भी मकां में भी शुकूं में भी परेशां भी  उदासी का सबब तुमसे मंजिल की बहर तुमसे खोना और पाना भी संकल्पों का समर्पण भी त्यागी हर बिरासत है अपनाया उसूं भी तु भेदों से विभेदों तक छुपा भी जो खुला भी सब समय की एक सीमा है कुछ दिन बस ठहर तु सब बादल जो वो बरसा है नदी फिर जो ऊफानों पर मेरे समुन्दर की लहरें हैं तु ही बस एक नाविक है

राख

साथ गहराता अन्धेरा हर समय चलता रहा मर चुका जो मन चिता की राख को मलता रहा पुण्य के कुछ काम जो अंशों में किये उधार हों अब फना हर उम्मीद हो साथ खामोशी रहे गुनगुनाऐं गीत जो कर्कश लगे गढते रहे मैं कल्पना के झाड़ पर धधकती सी आग हूँ जलता सा शहर हूँ विरान सा शमशान हूँ बरसों की लुकाछिपी और तन छोडता सा प्राण हूँ

चिताऐं

अब समय की दौड में कुछ हो अलग पहचान सी या कि रंगों के सरोवर या राख बदली रेत सी अग्नि कुण्डों में झुलस कर स्वाह हो अर्पण कभी कुछ चिताऐं शेष हों और मन मेरा औगण रहे लालसा बस शिव रहे और तु मृत्यु तक साधना मेरी

खण्डित

नदी समुन्दर ताज घाट सब भरवा रोटी स्नेह निरन्तर नई स्नेह के आकृतियों में माँ ममता सब देहरी तुझ तक समय ताँकती लम्बी दुपहर छोटी छोटी मुलाकातों पर सुनसान मनों में पडी रही वो पीडा दुविधा खुशियां तुझतक दे आये सब निशां यादों के लम्बित लम्बे झगडे मन के  खण्डित हर्षित पुलकित मन की बची हुई सब सांसे तुझ तुक

धूप

ये वक्त अलग है कि वक्त नही है समय की दरिन्दगी में मन का वेग नही है आशाओं के आसमान पर एक तारा है बादलों के पीछे एक फैला आसमा है कोपल फूटेगी दरख्तों के साये से कल्पना के बीज गहरे गुमशुम तो हैं  ढलता ही सही फकत उजाला अभी बाकी है रात लम्बी है तो क्या सुबह की धूप अभी बाकी है