खुद ही

मन चौरस की जमात बिछाये
ख़्वाब ख़ाली करने को है 
बिसातों पर बिछी रही कल्पनाऐं
फाँसों ने अजब चाल चलाई है 
दोष अपना ही होगा शायद
आस की फ़सल ख़ुद ही जलायी है 

मशाल लिये हम ख़ुद ही थे 
लाक्षाग्रह की अन्धेरी रातों मे 
पत्थरों पर उगती रही जो उम्मीदें 
आकाशबेल ने अजब जकड़ बनाई है
सन्देह की अंगुलियाँ अपनी ही तरफ़ रही
उम्मीदों पर ख़ुद ही क़हर बरपाया है हमने 

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