Posts

#NEET illustrate the gravity of the issue

Whenever a major examination paper is leaked in India, the initial public discourse usually focuses on the students, solver gangs, or small-scale cheating rackets operating at examination centres. News channels repeatedly show familiar scenes,  someone transmitting answers through devices, another solving papers for money, or individuals distributing slips outside examination venues. Society, too, tends to view these actors as the primary culprits. However, a deeper examination of the system reveals that they are merely the lowest links in a vast and deeply entrenched chain of corruption. The real game is played much higher up in the system where power, administration, greed, and influence converge. I have personally witnessed how cheating mafias operate, not merely isolated cases in individual rooms, but organized groups of students systematically engaging in malpractice. I have seen people stationed outside examination centres sending answers and coordinating cheating networ...

NEET जैसी राष्ट्रीय परीक्षा को लेकर देशभर में प्रश्न उठ रहे हैं

 भारत में जब भी किसी बड़ी परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होता है, तो सबसे पहले चर्चा उन छात्रों, सॉल्वर गैंगों या छोटे स्तर के नकल माफियाओं पर होती है जो परीक्षा केंद्रों पर नकल करवाते दिखाई देते हैं। समाचार चैनलों में वही चेहरे दिखाए जाते हैं , कोई ब्लूटूथ से उत्तर बता रहा है, कोई पैसे लेकर हल करवा रहा है, कोई सेंटर के बाहर पर्चियां बांट रहा है। समाज भी इन्हीं लोगों को सबसे बड़ा अपराधी मान लेता है। लेकिन यदि इस पूरे तंत्र को गहराई से देखा जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि ये लोग इस विशाल भ्रष्ट व्यवस्था की केवल सबसे निचली कड़ी हैं। असली खेल उससे कहीं ऊपर खेला जाता है , वहां, जहां सत्ता, प्रशासन, लालच और प्रभाव का गठजोड़ बनता है। मैंने स्वयं देखा है कि किस प्रकार नकल माफिया काम करते हैं। कैसे एक-एक कमरे में नहीं, बल्कि झुंड के झुंड छात्र संगठित तरीके से नकल करते हैं। कैसे कुछ लोग परीक्षा केंद्रों के बाहर बैठकर उत्तर भेजते हैं। लेकिन समय के साथ यह समझ में आया कि यह पूरी व्यवस्था केवल उन छोटे अपराधियों से नहीं चलती। यदि प्रश्नपत्र सुरक्षित रहे, यदि सिस्टम ईमानदार हो, यदि जिम्मेदार पदों पर ब...

जो है मन

समर्पण की साधना में अर्पित मन तुम ही तक है लिए हर बात में मापक समय की धार तुझ तक है जिसे मन व्यस्तता कहता वो सूनापन तुम ही तक है कौलाहल है समय बाँधे मगर शान्ती तुम ही तक है कभी ब्याबान सा मन है कभी खुश मन तुम ही तक है ये जीवन की हर अवधारणा जो है बस सब तुम ही तक है

सब्बी यन्नी छन

लगीं हौल्य माँ हौल्य लगौण वल्या नेता बण्यां छिन भुला अर पंजा उठे उठे ते मरदार भाषण द्योण छिन भुला पढ्यां लिख्यां ज्यादातर मास्टर ह्वेगीन अर ज्यूँन कभी आठवीं पास नी करी सी स्कूलों का अध्यक्ष बण्यां छिन भुला पलायन पर गीत ल्योखण वल्या देहरादून बस्यां छिन  अर ज्यून सची खे छै उत्तराखण्ड बणोण की औखाण सी बस राज्य आन्दोलनकारी कू कार्ड  खैंसा मा धर्या छिन भुला क्रिकेट ख्यनौ ते चारी सैण फिल्ड बणौण बल्या मोबाईल पर सट्टाबाज बण्यां छिन भुला गौ का ल्वार औजी सब्बी हरचिगिन अर बल नजीमाबादा ढोल्यौर बण्यां छिन भुला यी हाल भैर रौण बल्या भी छिन कि तन त सूट बूट बल्या हम भौत ह्वेग्यां पर देवता पूजण मा घौर नी जै संक्या भुला उत्राखण्ड मां बाघ नी हौलु भी मांणा पर मनखी मा मनख्यात नी भुला

चाहो तो

मुक्त करता हूँ मैं हर शपथ से तुझे कृष्ण कह जो गये थे सखा से कभी सारी बन्दिश मुझ ही तक रहेंगी सदा मुक्त करता हूँ हर बन्धन से तुझे  मैं निभाता रहूँ तुम भुलाते रहो साथ चलना जो चाहो अगर चल सकों  मैं रूका ही मिलूँगा उसी मोड पर उसी गाँव की तलहटी में प्रिये

गौ अब नी रैन

धारु पाणी गौ ग्व्यठार बडूं कू मान और छ्योटूँ कू संस्कार सब्बी बदलिग्ये भुला  गौ बस अब बढिग्या रैगिन किस्सा कहानियों  अर नेगी जी गीतों मा भुला नेता ह्वेगिन प्रधान ह्वेगिन  पंच सरपंच अर अध्यक्ष ह्वेगिन रीत बदली प्रीत बदली ढोल दमौ अर संगीत बदली सब्बी बदलिग्येन भुला गौ बस अब बढिग्या रैगिन किस्सा कहानियों  अर नेगी जी गीतों मा भुला नप्ती बदली उकाल उन्यार बदली नाचणों बाजू डीजे मा बदली दोखू हरची ट्वाल बदली लव्वा जनूं श्रृंगार बदली सब्बी बदलिग्ये  भुला गौ बस अब बढिग्या रैगिन किस्सा कहानियों  अर नेगी जी गीतों मा भुला चची तने चचा यने बौजी भी अब फुने ह्वेगी वीर भड लखडडूं लग्यों भुल्ली भी रील व्यली ह्वेगी सब्बी बदलिग्ये भुला गौ बस अब बढिग्या रैगिन किस्सा कहानियों  अर नेगी जी गीतों मा भुला पठाल बल्या कूडा नी रैन ख्योली म्योरी अर खंदरा नी रैन साजू खौल्यू अर धारू नी रे अब झुमैलुं मा स्व सग्वौर नी रे सब्बी बदलिग्ये भुला  गौ बस अब बढिग्या रैगिन किस्सा कहानियों  अर नेगी जी गीतों मा भुला

जलेबी की मिठास

मैं कहानियां बटोरता हूँ...  मुंबई की भागदौड़ भरी सड़कों पर आज मुझे कुछ ज़रूरी सरकारी काम से इधर-उधर जाना पड़ा। उबर बुक की, लेकिन लगातार दो बार ड्राइवर ने मना कर दिया। तीसरी बार जो गाड़ी आई, उसका नाम ऐप पर “रब्बानी” दिख रहा था। मैं गाड़ी में बैठ गया। थोड़ी दूर ही चले थे कि वो फोन पर किसी से बात करने लगा, उसकी बोली में यूपी का साफ़ लहजा था। मैंने उत्सुकता से पूछ लिया, “कहाँ से हो?”  “साब, यूपी से हूँ… बहराइच ज़िले से। आप नहीं जानते होंगे।” मैंने कहा, “अरे क्यों नहीं! यूपी में आगरा, मथुरा, अलीगढ़ से ही पढ़ाई की है मैंने।” इतने में वो फिर किसी को फोन मिलाने लगा। मैं अपनी ही सोच में था, उसकी बातों पर ध्यान नहीं दे रहा था। तभी अचानक उसने गाड़ी किनारे रोक दी। बिना कुछ कहे उतरा और सामने दिख रही एक जलेबी की दुकान से जलेबी लेकर वापस आ गया। मैंने सोचा, शायद अपने घर के लिए ले जा रहा होगा। लेकिन जैसे ही वो गाड़ी में बैठा, उसने मुस्कुराते हुए कहा, “साब, ये आपको खानी ही पड़ेगी , मुंबई की सबसे अच्छी जलेबी है!” मैंने नाम पूछना चाहा, पर वो खुद ही बताने लगा कि असली दुकान कहीं और है, ये उसकी शाखा...

Complacency in Institutions

One of the most significant challenges faced by the institutions is not an external threat but an internal one which is the development of complacency among those who work within the organization. This condition often evolves quietly over a period of time, without any immediate signs of crisis, yet over time it can gradually weaken the very foundations of an institution. When individuals or teams become comfortable with established routines and past achievements, and begin to believe that their institution is already among the best, the motivation to improve slowly diminishes. As a result, many members of the organization fall into a state of complacency. An institution that was once dynamic and ambitious may gradually shift from striving for excellence to merely maintaining the status quo. Consequently, it may find it increasingly difficult to adapt to the rapidly changing landscape of education. Living in past glories is our nature of workforce but sustain it is a habit and it requir...

जिन्दगी

लम्बा तय किया है रास्ता यहाँ तक समेट सब तो पाया नही हाँ ये अलग बात है छूटा कुछ भी नही यादों का एक सफर जिन्दगी साथों की सीख है जिन्दगी खोया बहुत कुछ है यहाँ पर भूला कुछ भी नही हर भीड में अकेली है जिन्दगी उठे हैं जितना गहरी है जिन्दगी पन्ने खाली छूटे हैं बहुत पर कोरा कुछ भी नही जो पाया है वो कब तय था खोने का कभी कुछ सोचा नही कर्मो की दहलीजों पर डटा रहा यूँ बस आशिषों से भरी है जिन्दगी

तुम्हारा

शान्ती तुम्हारी सोच तुम्हारी रीत प्रीत और मीत तुम्हारी गीत रचे कुछ पंक्ति अधूरी मंजिल सी हर आस तुम्हारी संग तुम ही से यौवन तुम से शान्ती अशान्ती और जंग तुम ही से चढती सांसे घूमिल यादें जीवन का हर रंग तुम ही से साथ तुम्हारा सफर तुम्हारा पाना खोना संकल्प तुम्हारा ढलता जीवन बढता संशय कर्मो का हर फल भी तुम्हारा