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थोडा आग

न बस्ती जलानी है न मन बुझाने हैं संघर्ष है जीवन थोडी आग भी जरूरी है प्रकृति है कि सुन रही है ज्वाला कोई धधक रही है सुस्त सोयी रहे कब तलक थोडी आग भी जरूरी है मंजिल पर चढाई बहुत है मकाम पर गहराई जरूरी है नये आयाम जो गढने हैं तो थोडी आग भी जरूरी है

वो नही

हर जहर पी लूँ शिव तो नही हूँ मैं आकार है अस्तित्व है निराकार नही हूँ मैं हर रस्सी चढ लूँ कलिदास नही हूँ मै शब्द हैं कलम है पर चैतन्य नही हूँ मैं और हाँ हर युद्ध जीत लूँ अर्जुन नही हूँ मैं पर अभिमन्यु हूँ वो नही कि हार मान जाऊँ मैं

सबकी वजहें

कहीं उम्मीदें कहीं इन्तजार  कोई ढलती शाम कोई सड़क वीरान बेरूखी की अपनी वजहें सबकी किसी के काम कोई परेशान कहीं वादें कहीं दास्तां कोई बढती बात कोई अधूरी पहचान बजहें सबकी किसी की कलम किसी के विचार 

आखिरी सांस

आखिरी जब सांस छूटे तब भी मैं जिन्दा मिलूँगा जल गयी जब राख सब तब भी मैं जिन्दा मिलूँगा कटते हजार पेडों टूटते जख्मी पहाडों सरहदें जब खत्म होंगी तब भी मैं जिन्दा मिलूँगा जब प्रणय की वेदना में प्रलय का आभास होगा लाम पर जब रण रहेगा तब भी मैं जिन्दा मिलूँगा समय के आखिरी छौर पर क्षितिज जब सिकुडा मिलेगा आस का हर बीज जब सडता मिलेगा तब भी मैं जिन्दा मिलूँगा

राह

राह चले पर चले कहाँ मंजिल ठहरी मिली कहाँ मैं गाढ गधेरा पहाडों से निकला तो फिर रूका कहाँ सपने बुने पर चुने कहाँ लक्ष्य सधे जो मिले कहाँ मैं 'ढुंगा माटा' पहाडों का खिसका तो फिर थमा कहाँ लोग मिले पर साथ कहाँ समूहों की पहचान कहाँ मैं असहज मोड पहाडों का जमा रहा फिर डिगा कहाँ

लौटना पडेगा

दौड आया मैं मीलों सफर साथिया जो मिली ना मिली तो ना मिली राधिका कृष्ण कब कह गये थे मैं लौटूँगा अब फिर भी मैं लौट आवूँगा सुन तु प्रिये सार रिश्तों के बाँधें हैं भगवान ने तार मन के बधे, बाँधें रखना प्रिये कृष्ण कब कह गये थे मैं लौटूँगा अब फिर भी मैं लौट आवूँगा सुन तु प्रिये मान सम्मान सारे किनारे रहे रखना कोने जरा सी जगह तु प्रिये कृष्ण कब कह गये थे मैं लौटूँगा अब फिर भी मैं लौट आवूँगा सुन तु प्रिये पहाडों कभी झील नदियों तलक मैं बहुँगा समन्दर की रेती प्रिये कृष्ण कब कह गये थे मैं लौटूँगा अब फिर भी मैं लौट आवूँगा सुन तु प्रिये मगहर रहूँ या कि मणिकर्णिका द्वारिका मेरी तुझमें समाहित प्रिये कृष्ण कब कह गये थे मैं लौटूँगा अब फिर भी मैं लौट आवूँगा सुन तु प्रिये

गुजर गये

गुजर गया ये  वक्त तेरे बिन कुछ कडवी सी यादों से पास बचा जो खट्टा मिठा साथ चला है सालों से दूरी कुछ लम्बी है हममें पास रहे कभी दूर हुऐ कुछ तो मेरे भाग मिले हैं कुछ औरों के  साथ मिले कुछ समेट पाया मनसे कुछ मनरे मनसे बिछड गये

यज्ञ का जौ

कुछ निशां होंगे  अपनेपन के जिन्हें छुपाना भी होगा मुझसे वरना अनायास मुलाकात ठुकराता कौन है हजार लाँक्षनों में भी  यज्ञ की अग्नि में चढा हुआ बीज हूँ या तो भष्म होना  या उगना सीखा सीखा है मैनें 

गढकरी जी

माननीय श्री नितिन गडकरी जी केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री, भारत सरकार विषय: केदारनाथ धाम को जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग-107 (NH-107) की अत्यंत जर्जर स्थिति के संबंध में। माननीय गडकरी जी, सादर प्रणाम। मैं उत्तराखंड का एक सामान्य नागरिक एवं इस क्षेत्र का मूल निवासी हूँ। बड़े विश्वास और आशा के साथ आपको यह पत्र लिख रहा हूँ, क्योंकि मुझे विश्वास है कि यदि यह विषय आपके संज्ञान में आएगा तो निश्चित रूप से इस पर गंभीरता से विचार होगा। केदारनाथ धाम देश के सबसे पवित्र तीर्थस्थलों में से एक है। प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु तथा हजारों स्थानीय लोग राष्ट्रीय राजमार्ग-107 (NH-107) से होकर यात्रा करते हैं। किंतु विशेष रूप से कुंड से गुप्तकाशी तक सड़क की स्थिति अत्यंत दयनीय, जर्जर एवं दुर्घटनाओं को खुला निमंत्रण देने वाली है।कई स्थानों पर सड़क टूटी हुई है, गड्ढों से भरी है तथा संकरी और असुरक्षित हो चुकी है। आश्चर्य की बात यह है कि अब तक कोई बड़ी दुर्घटना नहीं हुई है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह केवल बाबा केदारनाथ जी की कृपा है कि यात्रियों की रक्षा हो रही है। अन्यथा इस सड़क की वर्तमान स्थिति किसी...

विकल्प

विकल्प था अनुकल्प हूँ सम्बन्धों का नाजायज हूँ भावनाओं का उद्दीप्त ज्वार सूखता सा वृक्ष हूँ नास्तिक था निर्मोही हूँ अंहकार से विरक्त हूँ तोल मोल का भाव नही नहीं कभी तथस्ट हूँ राहें तय हैं मंजिल तय है निराकार तुझमें शामिल हूँ