NEET जैसी राष्ट्रीय परीक्षा को लेकर देशभर में प्रश्न उठ रहे हैं

 भारत में जब भी किसी बड़ी परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होता है, तो सबसे पहले चर्चा उन छात्रों, सॉल्वर गैंगों या छोटे स्तर के नकल माफियाओं पर होती है जो परीक्षा केंद्रों पर नकल करवाते दिखाई देते हैं। समाचार चैनलों में वही चेहरे दिखाए जाते हैं , कोई ब्लूटूथ से उत्तर बता रहा है, कोई पैसे लेकर हल करवा रहा है, कोई सेंटर के बाहर पर्चियां बांट रहा है। समाज भी इन्हीं लोगों को सबसे बड़ा अपराधी मान लेता है। लेकिन यदि इस पूरे तंत्र को गहराई से देखा जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि ये लोग इस विशाल भ्रष्ट व्यवस्था की केवल सबसे निचली कड़ी हैं। असली खेल उससे कहीं ऊपर खेला जाता है , वहां, जहां सत्ता, प्रशासन, लालच और प्रभाव का गठजोड़ बनता है।

मैंने स्वयं देखा है कि किस प्रकार नकल माफिया काम करते हैं। कैसे एक-एक कमरे में नहीं, बल्कि झुंड के झुंड छात्र संगठित तरीके से नकल करते हैं। कैसे कुछ लोग परीक्षा केंद्रों के बाहर बैठकर उत्तर भेजते हैं। लेकिन समय के साथ यह समझ में आया कि यह पूरी व्यवस्था केवल उन छोटे अपराधियों से नहीं चलती। यदि प्रश्नपत्र सुरक्षित रहे, यदि सिस्टम ईमानदार हो, यदि जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग अपने कर्तव्य निभाएं, तो नीचे बैठे किसी माफिया की इतनी क्षमता ही नहीं कि वह पूरे देश की परीक्षा प्रणाली को हिला दे।

असल प्रश्न यह है कि कोई प्रश्नपत्र लीक होता कैसे है? प्रश्नपत्र तैयार होने के बाद उसे अत्यंत गोपनीय “स्ट्रॉन्ग रूम” में रखा जाता है। उसकी सुरक्षा के लिए कई स्तर बनाए जाते हैं , सीलबंद पैकेट, निगरानी, सुरक्षा कर्मी, प्रशासनिक अधिकारी। लेकिन सच यह है कि यदि नैतिकता समाप्त हो जाए, तो इस व्यवस्था में सबसे नीचे बैठा एक कर्मचारी भी किसी न किसी तरीके से जानकारी बाहर पहुंचा सकता है। और यदि किसी संस्थान का प्रमुख, वितरण प्रणाली का अधिकारी, या प्रशासनिक तंत्र का कोई प्रभावशाली व्यक्ति इसमें शामिल हो जाए, तो प्रश्नपत्र बाहर निकालना और भी आसान हो जाता है।

यहीं से असली सिंडिकेट शुरू होता है। सबसे पहले फायदा उठाया जाता है अपने लोगों का, रिश्तेदारों का, परिचितों का, प्रभावशाली परिवारों के बच्चों का। फिर धीरे-धीरे यह जानकारी पैसे के बदले बाहर बेची जाने लगती है। एक व्यक्ति दूसरे को जोड़ता है, दूसरा तीसरे को, और देखते ही देखते एक पूरी श्रृंखला बन जाती है। फिर कोई कोचिंग वाला इसमें शामिल हो जाता है, कोई दलाल, कोई स्थानीय नेता, कोई अधिकारी। अंततः यह केवल “नकल” नहीं रह जाती, बल्कि एक संगठित उद्योग बन जाता है, जिसमें करोड़ों रुपये घूमते हैं और लाखों मेहनती छात्रों का भविष्य कुचल दिया जाता है।

 NEET जैसी राष्ट्रीय परीक्षा को लेकर देशभर में प्रश्न उठ रहे हैं। लाखों छात्र वर्षों तक कठिन परिश्रम करते हैं, परिवार अपनी जमा पूंजी खर्च कर देते हैं, बच्चे सामाजिक जीवन तक छोड़ देते हैं, और फिर यदि प्रश्नपत्र पहले से बिक जाए, तो यह केवल परीक्षा में धोखा नहीं होता, बल्कि मेहनत, ईमानदारी और प्रतिभा की हत्या होती है।

ऐसे मामलों में सबसे बड़ी जिम्मेदारी सिर्फ उन छात्रों की नहीं जिन्होंने गलत रास्ता अपनाया। सिर्फ छोटे माफियाओं की भी नहीं। सबसे बड़ी जिम्मेदारी उस पूरे प्रशासनिक और राजनीतिक ढांचे की है जिसके हाथों में परीक्षा प्रणाली की सुरक्षा होती है। शिक्षा मंत्रालय, परीक्षा एजेंसियों के प्रमुख, वितरण व्यवस्था के अधिकारी, और वे बड़े प्रशासक जिनके अधीन पूरा सिस्टम चलता है, जवाबदेही सबसे पहले वहीं तय होनी चाहिए। क्योंकि यदि ऊपर का तंत्र ईमानदार और कठोर हो, तो नीचे की भ्रष्ट श्रृंखला बहुत हद तक टूट सकती है। लेकिन समस्या केवल प्रशासनिक नहीं है। इसकी जड़ें समाज के बदलते मूल्यों में भी छिपी हैं। आज सफलता को नैतिकता से अधिक महत्व दिया जाने लगा है। लोग यह नहीं पूछते कि कोई सफल कैसे हुआ, बल्कि केवल यह देखते हैं कि वह सफल हुआ या नहीं। माता-पिता तक कभी-कभी बच्चों पर इतना दबाव डालते हैं कि वे किसी भी तरीके से सफलता चाहते हैं। समाज में ईमानदारी की जगह “जुगाड़” ने ले ली है। मेहनत की जगह शॉर्टकट को बुद्धिमानी माना जाने लगा है। यही मानसिकता धीरे-धीरे नकल और पेपर लीक जैसी घटनाओं को सामान्य बना देती है। जब समाज में मूल्य कमजोर पड़ते हैं, तब कानून भी अकेला कुछ नहीं कर पाता। एक समय था जब शिक्षक, अधिकारी और नेता समाज के आदर्श माने जाते थे। आज कई जगह वही पद लालच और प्रभाव का माध्यम बनते जा रहे हैं। धन की भूख, सत्ता का दुरुपयोग और नैतिक पतन मिलकर ऐसी स्थितियां पैदा करते हैं जहां शिक्षा जैसी पवित्र व्यवस्था भी भ्रष्टाचार से अछूती नहीं रह पाती। सबसे दुखद बात यह है कि इसका सबसे बड़ा नुकसान उन ईमानदार छात्रों को होता है जो दिन-रात मेहनत करते हैं। जब उन्हें लगता है कि मेहनत से ज्यादा कीमत पैसे और पहुंच की है, तब उनके भीतर व्यवस्था के प्रति विश्वास टूटने लगता है। और जिस समाज में युवाओं का विश्वास टूट जाए, वहां भविष्य भी धीरे-धीरे खोखला होने लगता है। इस समस्या का समाधान केवल कड़ी सजा नहीं है। समाधान नैतिक पुनर्निर्माण में है। परीक्षा प्रणाली को तकनीकी रूप से सुरक्षित बनाना जरूरी है, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी है जिम्मेदारी और ईमानदारी की संस्कृति बनाना। जब तक समाज में नैतिक मूल्यों का पुनर्जागरण नहीं होगा, तब तक हर नई सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद कोई न कोई नया रास्ता भ्रष्ट लोग खोज लेंगे। प्रश्नपत्र लीक केवल एक अपराध नहीं है  यह समाज के नैतिक पतन का दर्पण है। यह दिखाता है कि हमने सफलता को चरित्र से ऊपर रख दिया है। और जब तक यह सोच नहीं बदलेगी, तब तक नकल माफिया खत्म नहीं होंगे, केवल उनके चेहरे बदलते रहेंगे। इस सब मे सबसे जिम्मेदार शिक्षा मन्त्री धर्मेन्द्र प्रधान और प्रश्नपत्र सुरक्षा के लिए संस्था के अधिकारी हैं जिन्हे तुरन्त निरस्त किया जाना चहिए

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