राह
राह चले पर चले कहाँ मंजिल ठहरी मिली कहाँ मैं गाढ गधेरा पहाडों से निकला तो फिर रूका कहाँ सपने बुने पर चुने कहाँ लक्ष्य सधे जो मिले कहाँ मैं 'ढुंगा माटा' पहाडों का खिसका तो फिर थमा कहाँ लोग मिले पर साथ कहाँ समूहों की पहचान कहाँ मैं असहज मोड पहाडों का जमा रहा फिर डिगा कहाँ