जो है मन

समर्पण की साधना में
अर्पित मन तुम ही तक है
लिए हर बात में मापक
समय की धार तुझ तक है
जिसे मन व्यस्तता कहता
वो सूनापन तुम ही तक है
कौलाहल है समय बाँधे
मगर शान्ती तुम ही तक है
कभी ब्याबान सा मन है
कभी खुश मन तुम ही तक है
ये जीवन की हर अवधारणा
जो है बस सब तुम ही तक है

Comments

Popular posts from this blog

रिश्तों को अमरत्व

कहाँ अपना मेल प्रिये

छात्र कल्याण: (Student' Well- being) केवल शब्द नहीं, एक वास्तविक जिम्मेदारी