तू क्यों



तुझे खोने की कमी शायद पूरी न हो
छोड़ दे सारी गुमनामी मेरे लिए
ये ख़ामोशी  रिश्तो की कसक है
तू क्यों लुका छिपी औरों को बताता है

तेरा जो मक़ाम ऊँचा है उसे बनाये रख
छोड़ दे सारी बदगुमानी मेरे लिए
ये खपा होना रिश्तो की मिठास है
तू क्यों  औरों से नाराज दिखता है

तू बदल जा मेरे लिए इसका दुःख नहीं
औरों से तेरा बदलता व्यवहार न सुनु
ये भूलना भी इंतहां है मेरे सम्मान का
तू भी क्यों मेरी तरह हारने की जिद में है ....

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