धोखा लगा

ये शहर भी अपना था कभी
जो उजाड़ सा दिया गया
जिन फूलो को तू सम्मान मान बैठा था
वो भी कागज़ के ही निकले

यूँ लुढ़कते हुए उस हिमालय से
अरमानो की एक जागीर लिए
जिस गर्व की तलाश मैं निकला था कभी
वह सब तुझ पर आकर चूर हुआ

भावनाओ के मर जाने का दुःख नहीं हैं कभी
तेरा खजाना हैं तू संभाल कर रख या बाँट दे
जिस अपनेपन से मिलते थे कभी
तुझे जानने के बाद वो धोखा  लगा ........

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