दो मन

जब घर की किसी क्यारी में
कुछ फूल खिल जायें
जब सुबह बारिश की बूँदें 
उनपे झूलती हुई मिलें
उस प्रतिबिम्ब में कुछ याद आयेगा 
न ख़ुशबू न तितली होगी न भँवरा होगा
स्नेह का वो तोड़ता हाथ मेरा नही तेरा होगा 

जब कोई स्नेह से पिरोया गुलदस्ता 
घर के किसी कोने में मुस्कुराएे
फिर कुछ दिनों बाद 
सबकुछ मुरझा जाये
जब पत्ते झडें कली झडे
फिर जब न ख़ुशबू हो ताजगी
वो व्यथित मन सा मेरा होगा तेरा नही


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