तेरे जैसे हैं

वक़्त कब अपना हुआ
समय कब थमता लगा
वो सब भी तेरे जैसे हैं
दो घडी रूककर चल दिए

दिवशावसान के छौर पर
रात्रि के इस पहर में
ये काल भी तेरे जैसे हैं
इस उहापोह में खामोश हैं

मन में उजाला हैं बहुत
घनघोर काली रात हैं
ये पक्ष भी तेरे जैसे है
जो साथ हैं पर दूर हैं 

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