यात्रा के वृतांत

दुनिया की दौड़ मे 
कुछ पीछे रह गया
कुछ छुटा सा लगा 
तो कुछ छोड़ दिया

वरबस उलझे शहरां मे 
कुछ द्वन्द यूँ  रहा 
कुछ भूल सा गया 
कुछ भुला सा दिया 

यात्रा के वृतांतो में
पड़ाव कुछ यूँ आये 
कहीं सुस्ता से लिये
कहीं सरपट दौड़ लिये 

महमां शहर मे यूँ आयें
एक बस्ती बसती लगी 
कुछ ख़ानाबदोश निकले
कुछ शरणार्थी बने रहे 

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