ख़ाक जमीं

तमन्नाओं की ख़ाक ज़मीनों पर
कुछ उम्मीदें अब भी पलती हैं
ख़ामोश हों फिजाएं तो क्या
वो चिड़ियाँ अब भी चहचहाती हैं

शंकाओ के जलते अंगारों पर
औंस की बूंदें अब भी गिरती हैं
रोया हो हलधर मन तो क्या
वो फसल अब भी लहराती है

विफलता  के भारी बोझों पर
आस के बीज जमीं ढूंढ लेते हैं
कठिन ही रहा हो रास्ता तो क्या
मंजिल अब भी पास बुलाती हैं

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