शेष है

कुछ यूँ भी होते हैं 
जिससे दूर या पास
मायने नही रखता 
सड़क लम्बी होती है
हाथ छूने की उम्मीद
देखने की लालसा
अन्त सा होता है सब
फिर भी कुछ ख़त्म नही होता 
यूँही मनो के पास बसता है 

लगाव कही नही होता
जुड़ाव अपनेतक रहता है
रिश्तों का कोई नाम नही
भरोसा फिर भी लगता है
ख़्याल हँसी बिखेरता है
मनन खामोश कर जाता है
लालिमा स्नेह की ओढ़नी मे
ख़त्म होने पर आ भी जाय
पर सम्मान मन से रहता है 

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