भूल गए

भूल गये सब ‘घोंघा माता’
पवित्र जौं  की डाली भी 
चौखट पर फूलों की ढेरी
वो फूलों की टोकरी भी 

भूल गए वो फसल घंघरिया
वो चिड़िया शरमाई सी
रूकती चलती पायल खनखन
वो नदियां बलखाती सी

भूल गए वो कलम मदमाती
वो नजरे सकुचाई सी
बढ़ती थमती बर्फ धरा की
वो औंस सकुचाई सी

भूल गए वो ताने बाने
वो उलझन कतराती सी
आती जाती बेसुध सांसे
वो ओढ़नी लहराती सी 

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