जब से तु पत्थर हुआ

जब से तु पत्थर हुआ है 
तब से पूजा और गया है
एक नास्तिक को तुमने 
आस्तिक सा बना दिया है 

जब से पतझड़ आया है
तब से आस और जगी 
सुखे से एक रेगिस्तां में
बसन्त की फिर बहर चली है

जब से तु दूर गया है
तब से नज़दीकियाँ बढ़ गयी है 
जो शायद रहता था कुछ दूरी पर
अब वो मन मे बसने लगा है 

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