क्यों मन ?

क्यों तु मन में रहता है 
क्यों अपना सा लगता है
चलती फिरती राहों का 
क्यों सफ़र सुहाना लगता है?

क्यों मन तुझको रखता है
क्यों रिश्ता सा बुनता है
विपरीत धार हैं नदियाँ के 
क्यों इतना न समझता है?

क्यों मन हँसता रहता है
क्यों घोंसला सा बुनता है 
सरहद है अहसासों की 
क्यों लांघता रहता हैं ?

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