जब भी लगा

सहरा से निर्जन विस्तार पर
यूँ लगा कमल सा खिल आया
दो शब्द किसी ने लिख भेजे
जब भी लगा वो भूल गया 

पहाड़ों की शीतल चोटी पर 
यूँ लगा तरूण मृग चल आया
ऑंखों की पलकी झपकी है 
जब भी लगा वो भूल गया 

जंगल की घनी झाड़ियों से
यूँ लगा पंछी कोई उड़ आया
साँस की जिजीविषा लौटी है
जब भी लगा वो भूल गया 

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