हम रहवासी

हम रहवासी इश्क की नगरी
राह रही गुमनाम सदा
मंजिल के वो ठौर ठिकाने
मिले कभी कभी त्याग दिये

कान्हा की मुरली में बसते
शब्द बुलाते रहे सदा
जो खोना था खोया है
कभी पाया है कभी छोङ दिये

सीता के त्यागों की ठोकर
खुद पर खाते रहे सदा
त्याग समर्पण दिखा नही
कभी संताप सहे कभी झेल गये

पांचाली के बिखरे  वस्त्रो
की लाज बचाते रहे सदा
अपना कुछ सर्वस्व लुटाते
कभी स्वपन सजाये कभी तोङ दिये   

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