कभी
हज़ारों रंग उसके हैं
कभी पत्थर कभी मंजरी
कभी वो पास है सबसे
कभी दूरी नहीं मिटती
मिजाजों का सफर उससे
कभी गुस्सा कभी हंसती
कभी वो मन बसा सबसे
कभी अपना नहीं गिनती
शहर की हर चमक उससे
कभी जुगुनू कभी बाती
कभी खुद सा लगा सबसे
कभी अनजान रुस्वाई
मनों की प्यास हैं उससे
कभी नदिया कभी पानी
कभी संग संग बहा मेरे
कभी मीलों सी ख़ामोशी
समझाना जिन्हे मुश्किल
वही पहचान अपनों की
समझते सब हैं मनों की हैं
चेहरे पर वो नासमझी
Comments
Post a Comment