प्राण

हम पत्थरों में प्राण भरते हैं निरन्तर
मिट्टी को गाय को माँ कहकर पूजते हैं निरन्तर
स्नेह को परिभाषित करे वो कान्हा देव है मेरा
गले बिषसर्प  डाले है वो ही महादेव है मेरा 

वो जूठे बैर शबरी से और सूरज भी निगल लूँ मैं
पिता की साख पर घर छोडकर वनवास ले लूँ मैं
मैं धरा को चीरकर रणक्षेत्र में बाणगंगा सा प्रवाहित
उत्ताप शिखरों पर भी अनछुआ सा काकभूष्डी हूँ मैं

राधेय हूँ कौन्तेय हूँ  शिखण्डी और रणछौड हूँ
शत्रू की विजय सफल हो 'रामेशरण' का रावण हूँ
यज्ञ की अग्नि जनति मै भू धरा वैदेही हूँ
केवट सा दास हूँ सुदामा सा मित्र भी

मै कालचक्र का काल हूँ समय का ठहराव भी
हूँ सनातन मैं सदा निष्काम भी निष्प्राण भी
मणिकर्णिका की अग्नि हूँ  त्रिरजुगी का यज्ञ भी
शून्य का उदभव है मुझसे अन्नत का आसार भी

मै मिलूँगा हर समय तु संगम की गंगा मेरी
मै बहुँगा संग तेरे तु प्राण की वायु मेरी
तु आदि है तु अन्नत है तु राधा मेरी कुन्ती तु ही
स्नेह का अमरत्व तु मेरी कविता का हर शब्द तु

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