आयेगा

यूँ रात के इस पहर में
बारिश की ये दो बूँदें ही 
काफ़ी थी ये जताने के लिए 
कि अब तु न आयेगा 

यूँ बाढ़ मे घिरा छटपटाता
तृण को  बहते देखना ही
काफ़ी है ये मानने के लिए
कि अब तु न आयेगा 

यूँ गुमनाम सोचना तुझें 
इस रात की कालिका में
काफ़ी है ये मानने के लिए 
कि वो चाँद फिर भी आयेगा 

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