यथार्थ

चल मन उतर आ कल्पना की दीवारों से
यथार्थ की धरती पर छालें बहुत हैं 
कल्पना के कोरे काग़ज़ों  के चित्र 
बेरंग और और अमूर्त बहुत है 

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