तू कर्म भाग्य हो

इस राह की मंजिल तिरोहित 

फिर भी कदम बढ़ाना मुझे 

हो कहीं ओझल निगाहें 

यूँ सदा चलना  मुझे 


इस सपने की सुबह ओझल 

फिर भी ख़्वाब देखना मुझे 

हों कहीं रातें अमावस  

यूँ सदा जागना मुझे 


इस रिश्ते की पहचान गायब 

फिर भी सदा निभाना मुझे 

हों कहीं गुमनाम नाते 

यूँ सदा रखना मुझे 


उम्मीदों पर चला राहें 

बढ़ा हूँ एक आशा पर 

हों कहीं जो लिखा नहीं 

तू कर्म भाग्य हो मुझसे 


कहाँ कुछ आस थी तब भी 

समंदर एक लांघा है 

हों कहीं सुनसान वादे

तू फिर बुलाना मुझे 


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