एकांत
वो पल नहीं होता कभी
जब साथ तु रहता नहीं
एकांत का साथी है तु
अपूर्ण सा सपना कोई
जो चल पड़ा इस राह पर
अब कुछ मुड़ा जाता नहीं
एकांत का अहसास तु
मंजिल वही जो मिली नहीं
मन की एक उधेड़वुन
निष्कर्ष तक जाती नहीं
एकांत की गंगा है तु
वैराग सा है पथ कोई
मैं पा भी लूँ हर साथ को
लकीर वो हाथों नहीं
एकांत का चिंतन है तु
सांसों की आखिरी कड़ी
लाख हो मंजिल अधूरी
लाख सपने खाक हो
एक ख़ुशी पाने की है
एक ख़ुशी यादों में हो
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