हे! सूर्यदेव हे! गंगा माँ हे रश्मिरथी हे कुन्ती माँ मैं अपराधी अन्यायी मैं स्नेह ने एक कर्ण जना था कहाँ था साहस सच का और लोकलाज का भय था लिंग भेद का ज्ञान नही था स्नेह ने एक कर्ण जना था कहाँ बनेगा अधिरथ मानव साथ स्वयं की लाचारी परित्याग का भाव नही था स्नेह ने एक कर्ण जना था सीमाऐं साधी थी खुद को विश्वासों के कब कदम थे डगमग एकदूजे का साथ परस्पर स्नेह ने एक कर्ण जना था सच कडवा था साथ अडिग था दुनियां वही और जबाब नही था निश्चय दामन थामा हमने स्नेह ने एक कर्ण जना था माँ की ममता त्याग पिता का इन रिश्तों का शानी कब था पत्थर दिल अधरों पर ताले स्नेह ने एक कर्ण जना था रिश्तों की लाचारी बरबस खामोशी ने त्याग किया था प्रण साथ कर गया जीवन तेरे स्नेह ने एक कर्ण जना था जाते जाते अहसास दे गया हमको दो से एक कर गया रिश्तो को अमरत्व दे गया स्नेह ने एक कर्ण जना था
छात्र कल्याण: केवल शब्द नहीं, एक वास्तविक जिम्मेदारी आजकल की शिक्षा व्यवस्था में "छात्र कल्याण" एक प्रमुख विषय बन चुका है। यह प्रयास किया जाता है कि विद्यार्थियों को किसी भी प्रकार की असुविधा न हो, उन पर कोई मानसिक या शारीरिक दबाव न डाला जाए और उन्हें जबरदस्ती किसी चीज़ के लिए विवश न किया जाए। शिक्षा संस्थानों का प्रयास होता है कि विद्यार्थियों के साथ सदैव संवेदनशील, सहायक और सम्मानजनक व्यवहार किया जाए। छात्र कल्याण का तात्पर्य है विद्यार्थियों का संपूर्ण मानसिक, भावनात्मक, सामाजिक, शारीरिक और शैक्षणिक स्वास्थ्य । यह इस बात का संकेतक है कि विद्यार्थी विद्यालय में कितने सुरक्षित, समर्थित और प्रेरित अनुभव करते हैं, तथा वे जीवन की विभिन्न चुनौतियों का सामना किस प्रकार करते हैं। भावनात्मक कल्याण के अंतर्गत विद्यार्थियों का भावनात्मक रूप से संतुलित, खुश और आत्म-सम्मान से परिपूर्ण होना आवश्यक है। उनमें तनाव, भय या चिंता से निपटने की क्षमता होनी चाहिए और जीवन के प्रति आशावादी दृष्टिकोण विकसित होना चाहिए। सामाजिक कल्याण यह सुनिश्चित करता है कि विद्यार्थियों के सहप...
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