बोझ

जितने बहाने 
दूर जाने के थे 
उतने ही मौक़े 
पास आने के थे 
ये अलग बात है 
कोशिशें दोनों तरफ़
सिफ़र ही रही 

तेरे रास्तों की मंज़िलें
मेरे मंज़िलों के निशाँ 
कहीं मिल भी जाय तो क्या 
वो ख़ामोशी में तरसती शाम 
पलकों की नमी रोकें
बरसने के बोझ में 
मन मसोडते रहेंगे 

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