सुलगता गया

एक आग है धधक रही
वो ग़ुबार जो उठता गया
यादों के झुरमुटों में 
एहसास बस लुढ़कता गया

एक रंग है अबीर का
चढ़ता गया सजता गया
पूजन की थाली में 
वो दिया बस जलता गया 

एक जंगल है स्नेह है 
बढ़ता गया कटता गया 
हर आग की तलाश में 
वो ‘भुण’ बस सुलगता गया

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