तु शून्य मे भी

यूँ जब कभी शून्य हुआ

वो तेरा उपहास याद आया।

‘मन’ के विश्वास को

उन सुनी बातों पे गिरता पाया।

सम्मानों के शिखर पर रहा तु हरदम,

यूँ लाम पर भी तेरा एहसास रहा..

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