कब

हिमालय मुझको कब होना था!

रावण सा बाँहें फैलाकर 

सारा जग जीतना कहाँ था!

शबरी के झूठे बैरों सा  

जटायु के कटे पंखों सा 

सहृदय निश्चय त्याग कर सकूँ 

लक्ष्मण रेखा पार करना कब था 

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