सम्पूर्णता

 कभी ठहरा कभी गहरा 

कभी बहता लगा जीवन 

मैं यूँ तो एक तमाशा था 

मेरी पहचान है तुझसे  


कभी बहका  कभी रोता

कभी हसता लगा जीवन 

वो चेहरे लाख ओढ़े थे 

मेरी बदमाशियां तुझसे 


कभी पाना कभी खोना 

कभी जो स्याह था जीवन 

मैं यूँ तो एक सिफर ही था 

मेरा अब भाव है तुझसे 


तमन्ना कब की पा लूँ सब 

सदा बे अर्थ था जीवन 

रहा जो सिर्फ आधा है 

मेरी सम्पूर्णता तुझसे 

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