Posts

मौन की आवाज़

  मौन की मौन को एक आवाज़ है  सुन सको जो कभी शब्द सार्थक बने इन अंधेरों में भी रौशनी व्याप्त है  फिर मशालें जलना मुश्किल नहीं  पीड़ की नीव पर एक पड़ा हौंसला  साथ हो तो कभी बात सार्थक लगे  हर तरह भीड़ है शोर  प्रभूत है  शांति से हल निकलना मुश्किल नहीं  हर्ष के बीच का एक बड़ा फ़ासला दो कदम हम चलें लक्ष्य सार्थक लगे  तेरी मेरी बनी हर दीवारे गिरें  शासनों तक पहुँचना मुश्किल नहीं 

धारा

पोखर की ख़ुशबू सी सोंधी  कोमल मिट्टी सा नाता  छू लूँ तो मटमैली काया  निहारूँ तो अपना साया  कलकल बहती गुप्त धरा पर  मन के अन्दर की घारा  छतबत छतबत भीगा हूँ  मैं    कैसे सुखे अविरल धारा 

भारत

म्येरु हिमालय देश म्येरु  म्येरी पवित्र गंगा -२ चमकणु केदार म्येरो  म्येरो गितागं बगां - २  कश्मीरे की क्यारी केसर  फूलो की म्येरी घाटी निवतु राजस्थान म्येरु  शीश चम्बल माटी -२  रणभेदी का रण बजेन माँ भारती माटी  माया की बाँसुरी बजेन ब्रज भूमि की थाती  माँ बाबा की जन इच्छा मा राजपाठ त्यागी  बचन का यन धन्य रैन इच्छा मृत्यु त्यागी  वीर भंडों कू देश रंगीलो  त्यौहारों की खान छ दुनिया मा एक अजब च म्येरो भारत देश महान च   

कहने का अधिकार रखो

  कटते पेड़ की पीड़ा या बिलबिलाती चिड़िया का दर्द लिखो  अपराध कहीं हो जग में कोई  कहने का अधिकार रखो रोक नदी पर बांध कहीं या  कटती धरती सड़क लिखो  अन्याय  कहीं हो जग में कोई  कहने का अधिकार रखो जलते उजड़ते जंगल हो या गहरी खुदती खान लिखो  अपराध कहीं हो जग में कोई  कहने का अधिकार रखो सूखी रोटी भूखी जनता आंदोलन के अवतार लिखो  अन्याय  कहीं हो जग में कोई  कहने का अधिकार रखो पेट फुलाये व्यापारी या आत्मघाती किसान लिखो  अपराध कहीं हो जग में कोई  कहने का अधिकार रखो कुचली दबती लाज कहीं या बंजर धरती का अभिशाप लिखो  अन्याय  कहीं हो जग में कोई  कहने का अधिकार रखो

वो चंदा सी लगती है

  सुनी शाम सुबह महकी सी  हर पल मन में रहती है  चुप रहती है आध रात सी  कलकल नदिया बहती है  दूर खड़ी वो मृगतृष्णा सी  पास बुलाती रहती है  कर देती है टूख पर मुझको  नींव बनी ही  रहती है  उग आती है तुलसी बनकर  घर आँगन महकाती है  आसमान सी दूर बहुत है  वो चंदा सी लगती है 

एेसा हो जाये

यूँ बेरंग होकर भी रंग जो चढ जायें बिना कुछ कहें  असर जो हो जायें  मलाल जाने का तेरा रहा हरदम  काश कुछ एेसा हो कदम फिर सहम जायें  यूँ गुमशुम होकर भी तन्हाई कहीं खो जाये सुनसान हैं राहें बहुत फिर भी मन अधीर है ख़ामोशी सुनी मन की शोर कम हो जायें   काश कुछ ऐसा हो  कि वो हलचल हो जायें 

अब भी

मैं कश्ती किनारे  छोड आया हूँ  तन्हा कहीं दूर  चला आया हूँ  मुड़कर कुछ  दिखाई नही देता  मैं सपनों की  दुनिया छोड आया हूँ  टिमटिमाता वो  तारा अब भी है सौंधी ख़ुशबू का  वो झोंका अब भी है  कच्चा ही सही  वो हुनर बचा है कहीं  मै सपनों की दौड़ में  अब भी शामिल हूँ 

तु गुमशुम सा रहता है

 नदी हिमालय जंगल झरने सा तु मन में रहता है  कविता गीत ग़ज़ल सा मन लिखता तुझको पढ़ता है  अपने पराये बन्धन से मन अलग खडा ही रहता है  भीड़ भरे कोलाहल मन में तु गुमशुम सा रहता है निंदिया  चंदा सात समंदर सा तु दूर ही रहता है  पंछी चिड़िया मंद हवा सा मन तुझ तक ही उड़ता है  बसने उड़ने से अलग कहीं मन बीज पड़ा तु रहता है  ख़त्म हुई सब आस के मन में तु गुमशुम सा रहता है सड़क सफर उम्मीदें मंजिल तु चलता ही रहता है  माँ ममता बचपन दादी सा मन में तु ही रहता है  पाने खोने से पहले कहीं मन तुझ तक ही तो जाता है  छूटे बिछड़े खोते  मन में तु गुमशुम सा रहता है 

हम पहाडी

  नदी हिमालय जंगल झरने   बाँझ बुरासों के 'अग्वाल' लगेंगे  हम पहाड़ी, पहाड़ो के सब दर्द लिखेंगे खोदोगे पहाड़ कहीं  या जंगल काटोगे  हम पहाडी पहाड़ो के हर अधिकार माँगेंगे टूटी फूटी सड़क कहीं खिसकते पहाड़ बोलेंगे  हम पहाडी पहाड़ो की हर बात लिखेंगे  रोजगार विकास को टोहे  हर पलायन का दर्द कहेंगे  हम पहाडी पहाड़ो के  हर हाल लिखेंगे  रोक नदी पर बाँध बनाये  उस बिजली का दाम मांगेंगे  हम पहाडी पहाड़ो के हर सवाल पूछेंगे प्रसव पीड़ा में मरती नारी  बंद स्कूलों के ताले खोलेंगे  हम पहाडी पहाड़ो के हर घोटाले खोलेंगे  देवस्थानों पर तानाशाही  शासन के  राजशाहों को धिक्कारेंगे  हम पहाडी पहाड़ो के हर अधिकार मांगेंगे  देख, पहाड़ी जनता जागी अब दरबारों  से जबाब मांगेंगे  हम पहाडी पहाड़ो के हर अधिकार मांगेंगे 

लौटने का मन

अब लौटने का मन करता है  मैं शायद दौड़ न सका  ख्याईशें तो थी बहुत  मैं घर भूला न सका  थक गया हूँ रोज की बहसों से  मैं हर रिश्ते को ढों न सका  कहना तो बहुत था सबसे  मैं खुद से कुछ कह न सका  तोड़ती रही सीमायें नजर की  मैं सामाओं में बन्ध न सका  लॉंघां तो सब जा सकता था  मैं वो खूँटा भूला न सका  कुछ यार थे कुछ रिश्तेदार थे  मैं हर अपने को मना न सका  बढ़ तो गया था कुछ दूर शायद! मैं छोटा था, माँ को भूला न सका  अब लौटने का मन करता है  मै शायद दौड़ न सका ...