Posts

ताना बाना

तुम हम का यह ताना बाना  एक सम्पूर्णता दे गया साथ दिया जो तुमने हरपल  हल सारा दुख हो गया मुझमें समाया तुमको पाया  खुद में तेरा हो गया तुम हम का यह ताना बाना  जीवन जीना सीखा गया  आ मेरी परछाई बन जा छाया बन हम साथ रहें  थाम के अंगुली साथ बढें सफर हमसफर निभा जायें खुद को खोकर तुझमें समा लूँ आ कुछ ऐसा कर जायें   मेरा तुझमें नाम पता हो तुम पहचान हमारी बन जाओं

जलन

बस कुछ गुमान अपने तक रखता हूँ साथ जरा लगे कोई एक जलन रखता हूँ ये स्वीकारोक्ति है कि तु हमसाया है मेरा मन छोटा सा है पर तु अभिमान बडा है मेरा अधूरा ही सही एक ख्वाब अपने तक रखता हूँ पा न भी सकूँ तो एक कोशिश में रहता हूँ ये माना है सदा कि तु हिमालय है मेरा मन उथला सा है पर तु एहसास गहरा है मेरा

संगम

मैं संगम पर तुझसे मिलकर तुझमें समाना चाहता हूँ खोकर सब अंहकार मैं अपने तुझको, गंगा बनाना चाहता हूँ तु जीवन दायनी सपन सजोये अंजुरी जल भर तर्पण कर दे मोक्ष मिले सब तुझमें समाकर तुझको मणिकर्णिका बनाना चाहता हूँ मैं समर्पण पर जीवन देकर  सब साथ निभाना चाहता हूँ तुझमें रहकर तेरा होकर  तुझको अपना ईष्ट बनाना चाहता हूँ तु सोख हिमालय सा अब चमके पाषाण अन्दर साथ निभाऊँ पहचान मिले सब साथ तुम्हारे तुझको माँ सा चाहना चाहता हूँ मै हूँ  तेरा तुझे समर्पित तुझको गंगा बनाना चाहता हूँ

मिट्टी सा

मैं मिट्टी सा बिछ जाऊँगा तु  फूल क्याँरियां खिल जाना मैं पात अरूई फैलूँगा बूँदे मोती तुम बन जाना मैं सागर सा बिन सीमा के  तु घर की चौखट बन जाना बाँह फैलाकर जब मैं पुकारूँ  तु वही समर्पण कर जाना रातों के सुनसान पहर का मौन गीत बन गुनगुना जाना मेरी खिसकती लगी जमीं पर  तु पक्की नीव लगा जाना

हमारा

वेदना भयभीत होकर  साँवन्तना मन दे गयी  हम समर्पित कर चले  एक निशानी साथ की है कहाँ मुमकिन जहां में  हर फूल यौवन तक बढ़े यूँ ही नहीं अर्पित रहे हैं  गंगा में कुछ  दीप भी  समर्पण की साख पर  यातार्थ जीता है सदा  यूँ ही नहीं शापित रहे हैं  पत्थरों के झुण्ड भी  हम अमरबेलों से कहाँ  सब जड़ों तक बँध सके  रात की घनघोर कालिख आंसुओं में बह गयी  

गांव को शहर में लाया हूँ

 मैं गांव को शहर में लाया हूँ  खुले खेत खलिहानों को  मीनारों से ढक  आया हूँ  गंगा में नहाने वाला अब  रौशनी से चौंधियाने लगा हूँ.... मिट्टी तन से सनी हुई जो   इत्तर से ओढ़ आया हूँ  शामों के घर पगफेरै अब  रातों में जगने लगा हूँ .... उम्रदराजी सम्मानों को  नामों से कहके बुलाता हूँ  दोस्तों पर हक़ अपनापन अब  सोच समझ के जताता हूँ  मैं गांव को शहर में लाया हूँ 

कहने और करने में

 शायद बहुत सही है तु जब तु कहता है कि  मेरे कहने और करने में फर्क है मेरी हर बातों में एक झूठ है  हाँ में उतना कहता नहीं  जितना माना है तुझको  उतना जताता नहीं  जितनी उम्मीदें हैं तुझसे  हाँ उतना समय नहीं देता  जितना वक्त कम है मुझमें उतना हक़ नहीं जताता  जितना मानता हूँ तुझको   यूँ है कि उथला है सागर बहुत  बहना है दूर पर सीमाओं ने बाँधा है  रहना है साथ तेरे  और समाकर ख़त्म हो जाना है  मेरी कोशिशों में कमी हो  तो शक सूबे हो मुझपर  और जो मेरे होने से अशांति हो  तो मेरी सांसों को ठहराव मिले जिंदगी   

उदासी

स्नेह के ख्यालों से  कब कौन उदास लगा है  ये बेचैंनी है जो चहेरे को  मायूस कर जाती है एक तेरा होना ही  हर खुशी है मेरे जहां की मैं परेशां हूँ कि गुस्सा हूँ  मन की रौनक तेरे नाम से है उठता है भरोसा कभी जब  अपना कुछ कर न पाये ये घडी परीक्षा की है  चल कुछ दूर साथ तो सही रास्तों में धूप होगी  तो सुहानी शाम भी होगी काखों पर रखी  यादों की कोई गठरी भी होगी  चल हंसकर करते हैं  तय रास्ते कुछ दूर रास्ते की मंजिल भी तु है  और रास्तों के निशां भी तु

गहराईयां नही

मैं इतना जरूरी कब था  कि तु मेरे लिए जगा रहे रात भर मेरी बातों में इतनी गहराई कहाँ  कि तु सुनता रहे दिनभर एक दिन यूही डूबना है मुझे  खुद के आकाश में  मैं जानता हूँ मेरा सफर  मेरे बस का नही है  वक्त भी तेरा है नजाकत भी तेरी  और ये निजाम भी तेरा मैं पहाडों से लुढका पत्थर हूँ बस ये रोकना मेरे बस का नही

तु ही है खामोश

मन जब आधा अधूरा हो, तो चुप रहना ही अच्छा बातों की मेरे नैपथ्य में एक चुलबुल चेहरा रहता है शब्द बनाने पडते हैं जब तु खामोश रहता है यही खामोशी एक दिन मुझको अकेला करके छोडेगी मेरे हर ध्यान में तु है  मेरे हर कर्म में तु है तु है सब सत्य बाबा सा तुही महादेव सा भी है तु ही मन की है जागृति ये खामोश सांसे तुझसे हैं