दर्पण

‘मन’ मन मेरा दर्पण है
जो देखोगे दिख जायेगा 
झूठ लिखोगे झूठ दिखेगा 
सत सत सच को समर्पण है

तन तन मेरा अर्पण है
जो कहोगे कर जायेगा 
दंश रचोगे दंश मिलेगा
लख लख तुमपे तर्पण है

अंग अंग मेरा नश्वर है
जो कहोगे लुट जायेगा 
घिन करोगे घिन मिलेगा
तर्स तर्स न्यौछावर है 

तज तज मेरा रोम रोम है 
जो कहोगे मिट जायेगा 
साथ रहोगे साथ चलेगा 
व्यय व्यय जीवन मन्तर है 




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