हे! सूर्यदेव हे! गंगा माँ हे रश्मिरथी हे कुन्ती माँ मैं अपराधी अन्यायी मैं स्नेह ने एक कर्ण जना था कहाँ था साहस सच का और लोकलाज का भय था लिंग भेद का ज्ञान नही था स्नेह ने एक कर्ण जना था कहाँ बनेगा अधिरथ मानव साथ स्वयं की लाचारी परित्याग का भाव नही था स्नेह ने एक कर्ण जना था सीमाऐं साधी थी खुद को विश्वासों के कब कदम थे डगमग एकदूजे का साथ परस्पर स्नेह ने एक कर्ण जना था सच कडवा था साथ अडिग था दुनियां वही और जबाब नही था निश्चय दामन थामा हमने स्नेह ने एक कर्ण जना था माँ की ममता त्याग पिता का इन रिश्तों का शानी कब था पत्थर दिल अधरों पर ताले स्नेह ने एक कर्ण जना था रिश्तों की लाचारी बरबस खामोशी ने त्याग किया था प्रण साथ कर गया जीवन तेरे स्नेह ने एक कर्ण जना था जाते जाते अहसास दे गया हमको दो से एक कर गया रिश्तो को अमरत्व दे गया स्नेह ने एक कर्ण जना था
न द्यू रे न धूपणु रे पुरणी मूर्ती अर खडग नी रे कोठू बच्यू रे देवी कु म्योल माटा लिपे ह्वे न श्रृंगार बच्यू रे कूडा रैन मनखी नी रैन दार बच्या छन पर धूरपुल्यी उखिडिग्येन पूजा नी ह्वे पाठ नी ह्वे हरयल्यी नी बुतिन जौ नी लगेन म्योलौ मादेव कडकूडू ह्वेगी तब भी शक्ति बची रे पर स्थापन नी ह्वे कुल का देवत्यों आशिर्वाद रे पर कुल छितरेग्ये शंख हरची गडसों हरची कैन च्योरी नी के पर क्वजडी कुछ नी रे गौ रिता द्यूल रितू खौलू उखडी पठली सरकी ख्वोली पर रंग बानिश नी ह्वे न साज रेन न संस्कार रेन न अपणू स्यूं अभिमान रे गौ बच्यू रे पर बाटा सब्बी बदलिग्येन
दौड आया मैं मीलों सफर साथिया जो मिली ना मिली तो ना मिली राधिका कृष्ण कब कह गये थे मैं लौटूँगा अब फिर भी मैं लौट आवूँगा सुन तु प्रिये सार रिश्तों के बाँधें हैं भगवान ने तार मन के बधे, बाँधें रखना प्रिये कृष्ण कब कह गये थे मैं लौटूँगा अब फिर भी मैं लौट आवूँगा सुन तु प्रिये मान सम्मान सारे किनारे रहे रखना कोने जरा सी जगह तु प्रिये कृष्ण कब कह गये थे मैं लौटूँगा अब फिर भी मैं लौट आवूँगा सुन तु प्रिये पहाडों कभी झील नदियों तलक मैं बहुँगा समन्दर की रेती प्रिये कृष्ण कब कह गये थे मैं लौटूँगा अब फिर भी मैं लौट आवूँगा सुन तु प्रिये मगहर रहूँ या कि मणिकर्णिका द्वारिका मेरी तुझमें समाहित प्रिये कृष्ण कब कह गये थे मैं लौटूँगा अब फिर भी मैं लौट आवूँगा सुन तु प्रिये
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