अकेला तो है

यादो मे रहता अजनबी
एक शूल सा चुभता है 
तिल-तिल सताता तो है
पर कभी कुछ कहता नही 

जो देखता है मुड़के अक्सर 
पर कहीं नज़र मिलाता नही 
सोचता वो भी होता होगा 
मगर कभी कुछ जताता नही 

जो नज़रों मे है हरदम 
ज़ुबान मे कभी आता नही 
अकेलापन तो उसका भी होगा 
साथ कभी कोई देता नही 




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