अचेतन

जब जब गाँव की गलियाँ मेरी 

जब जब बौरायें झरनें पहाड के 

माँ मुल्क ने पुकारा जब जब 

जब जब गीत लिखे मल्हारी 

याद रहा वो स्वरुप अचेतन

तु बाबा! या वो रुप अकिंचन 

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