गहरी रही

 दूरियाँ की खिड़कियाँ थी
मचान पर कभी चढ़ा नही 
कारवाँ को देखता रहा
कभी साथ में चला नही

सपनों  की सोच पर 
पडा रहा वो अदृश्य था 
आसपास ही लगा सदा 
कभी पास वो चला नही 

सम्मान के शिखर पर 
डटा रहा डिगा नही 
विश्वास की एक नींव है 
गहरी रही कभी दिखी नही 


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