संदेह के जाल

नादां था ये मान बैठा 
कि कुछ तो असर था 
स्नेह की क्यारियों का
बबूल जसतस ही था

जिसे तु संजोता रहा
हर बार मेरी हार पर 
उस संदेह के जाल को
बहेलिया ही तो लाया था 

सोचा था कि कुछ झूठ 
गहरे दब गये होंगें  
दिवार जो टूटी लगी थी
दो मनों के बीच !!

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