थोडा आग

न बस्ती जलानी है
न मन बुझाने हैं
संघर्ष है जीवन
थोडी आग भी जरूरी है

प्रकृति है कि सुन रही है
ज्वाला कोई धधक रही है
सुस्त सोयी रहे कब तलक
थोडी आग भी जरूरी है

मंजिल पर चढाई बहुत है
मकाम पर गहराई जरूरी है
नये आयाम जो गढने हैं
तो थोडी आग भी जरूरी है

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