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रंग चढ़ा रहा

मनों के रास्तें जो अब विरान रहें  किसी के क़दमों की थाप आती रही  ख़ाली सुनसान पड़ी उन जगहों से  कोई नज़र हर बार झांकती लगी  उन उदास रास्तों के छिटके फूलो में  एक मुरझाया सा फूल हँसता मिला  हज़ारों सम्मलित रंगीन महफ़िलों में उसकी सादगी का रंग अब भी चढ़ा रहा पेड़ों से गिरते पत्तों को देखा जब कभी अपनो की वो तलाश हवा मे उड़ाती रही ठिकानों की भटकती तलाश अन्धेरे में  हर बार उसकी रोशनी में चकाचौंध रही 

वो कुरेदा नाम

सपनों को लिखता हूँ  यादों को बुनता हूँ  लम्बा तेरे बाद का शीतकाल यादों को ओढ़कर सोना चाहता हूँ    उगाये गये उन पेड़ों पर  फिर वो नाम कुरेदता हूँ  शिलान्यास तेरे अवशेष बन जायेंगे  वो दर्द ज़िन्दा रखना चाहता हूँ  छिटके गये उन बीजों पर  फिर कोई भारी पत्थर रखता हूँ  रिश्ते सब भुला भी दिये जाय तो क्या वो अपनापन ज़िन्दा रखना चाहता हूँ 

तु खोया नही

तु सुनता भी है  जताता भी है  मानता भी है  भागता भी है  दूरियों मे  हो पर पास है  तु छुपता तो है  पर ओझल नही  नज़र मे रखता है  फेर भी लेता है झकझोरता भी है  खामोश भी रहता है  खो जाता है  तो मिल भी जाता है  तु छुपता भी है  पर खोया तो नही 

खामोश है

बदलते हर पन्ने पर चेहरे वो अंजान हैं किताबों के ढेर मे एक कहानी गुमनाम है  मेंढों की क़तारों पर उगी कुछ घास है  अनाजों के ढेर में बीज कहीं दबा सा है   पथरीलें रास्तों पर ज़मीं कुछ शैवाल है  बरसात के शोर मे गाँव अब खामोश है  तेरी ढीठ आदतों पर मेरी वो बदमाशीयां है  जानता तु भी है मैं भी  बस मन है कि खामोश है     

बची रही

तांकता हूँ उम्मीदों के आसमान को  क्या पता बरस जाये वो नीर उसके ठूंठ बन जाने से पहले  वो कुछ जड़े हरी बची रहीं  सोचता हूँ उम्मीदों के मंज़र को  क्या पता फिर दोहरा जाय वो शाम उसके ढल जाने से पहले  वो कुछ यादें ताज़ा बचीं रहीं  देखता हूँ अरमानों के उस शून्य को  क्या पता फिर नज़र आये वो तारा  उन बादलों के आने से पहले  वो कुछ छापें मनों पे लगी रहीं 

सबका मान है

किसी की दुवाऐं लेता हूँ  किसी की बद्दुआएँ लेता हूँ  सबके लिए मन से नही  अक्सर सच के साथ होता हूँ  कोई चुपके से मन में रखता है  कोई मक्खी की तरह फैंक देता है गिला किसी से भी नही  अक्सर भावनाओं को एकतरफ़ा रखता हूँ  कोई चुराके नज़र सम्मान करता है  कोई लगातार उपयोग करता है  मन जानता सबकुछ है खामोश सबका मान रखता हूँ 

लौटती जरुर है

जिसे बिना सोचे ही लिख लेता हूँ  यादों के गहरे समुन्दर में  एक पत्थर सा उछाल देता हूँ  अस्तित्व को तलाश करती कोई आवाज़ तुझसे टकराके लौटती जरुर है  जिसे बिना देखे ही समझ लेता हूँ  सुनसान कमरे के उस आईने में  अपने से प्रतिबिम्ब को झकझोर देता हूँ  अंधेरे को चिरती प्रकाश की कोई किरण तुझसे टकराके लौटती जरुर है  जिसे बिना छुये ही महसूस कर लेता हूँ  अंगुलियों की उस झन्नाहट मे  यादों का एक गीत सा रच देता हूँ  शब्दों के अनसुलझे जाल मे कोई कविता तुझसे टकराके लौटती जरुर है 

सुनहरी प्रभात

किसे जीतकर भी शुकुं नही कोई हार कर भी ख़ुश है  ये बस मनों की बात है  कभी मुश्किलों के पहाड हैं  कभी सुनहरी प्रभात है  कोई पाकर सब अकेला है कोई टूटकर भी साथ है  ये सब विधी का विधान है  कभी स्याह घनघोर रात है कभी सुनहरी प्रभात है  कोई बताकर कुछ जता न सका कोई चुप रहकर भी सब कह गया ये बस समझने की बात है  जब झूठ के पूलिन्दों की हार है  और यहीं सुनहरी प्रभात है 

अच्छा है

ये संशय भी अच्छा है  बन्द आँखों से पढ़ना है  लिखी हुई कहानी का  अन्त न हो ये अच्छा है  ये मौसम भी अच्छा है बिन बरसे बादल उमड़ा है बहती हुई नदियाँ  का  कोई छोर न हो ये अच्छा है  ये साथ ख़ामोशी का अच्छा है  पलकों की नमी सलामत है गरजती गिरती उस बिजली का  वो तेज़ उजाला भी अच्छा है 

तेरे मेरे बीच

तेरे मेरे बीच बना पुल इस अंधड़ में जिन्दा है बस इतना बिश्वास था मेरा बाक़ी कुछ नहीं चाहा है तेरे मेरे बीच की बातें यूँ तो बस ख़ामोशी है 'मन' 'सच्चाई' के पास रहा है बाक़ी सब पहरेदारी है तेरे मेरे बीच की दुनिया यूँ तो बहुत वीरान रही फूल खिले हैं फिर भी उसमे बाक़ी सब काँटेदारी है तेरे मेरे बीच की नजदीकी यूँ तो अक्सर मीलों है दूर ही रहा है हिमालय मेरा बाक़ी साथ चली तन्हाई है ..