Posts

बिना किसी

जो गुथां रहा धागे में पिरोया रहा एक कड़ी में  मज़बूती से विश्वास डटा रहा माला के फूल और मोती  यूँहीं बिना किसी आधार जुड़े नही रहते   जो सदैव सोच में बना रहा  गीत ग़ज़लों की लड़ी बनकर  सहूर से स्नेह बना रहा  जुड़ाव की आस और याद यूँही  बिना किसी अपनेपन के जुड़ी नही रहती 

नींव के पत्थर

बिखरे हुए मकां की  अधूरी इमारत टूटे खण्डहर बन भी जाय  तो क्या  साँचों के निशाँ  मेरे होने की गवाही देंगें  खोदना गहराई में कभी  मज़बूत नींव के पत्थर मिलेंगे  आशाओं के बिखरे आसमान पर  सबकुछ धुँधला हो भी जाय तो क्या विश्वास का अटका कोई तारा मिलेगा सोचना कहीं समर्पण कोई   गिरकर राहों मे बिछते कुछ पत्ते मिलेंगे  आशान्त पड़े समुन्दर से मन मे  सब कुछ छिन्न भिन्न हो भी जाय तो क्या  आस का तैरता कोई जहाज़ मिलेगा  उड़कर थक जाओ जब कभी    नीचे सहारा देने को कुछ पाल मिलेंगे 

तब तक

बताने को तो तजुर्बा भी था  जताने को अहसास भी था  ये  स्नेह तब तक ही सच्चा था  जब तक सबकुछ एकतरफ़ा था  छुपाने को ख़ुशियाँ भी थी  कहने को कहानियाँ भी थी  ये शाम तब तक अपनी थी  जब तक कभी रुलाती न थी  बाँटने को तो यादें भी थी  लिखने को थोडे ग़म भी थे  ये क़लम तबतक ही अपनी थी  जब तक कभी चली न थी 

मन मे हो

दीपदान जब मन का हो त्याग समर्पण मन का हो  मन जायें यादों के उत्सव  प्रकाश पुंज जब मन का हो  कुंज गली जब मन में हो गोकुल बरसाना मन में हो उग जाये सपनों के जंगलों  आस अहसास जब मन मे हो शाम सुहानी घर में हो बात पुरानी घर में है  हंसतीं हों कोने मे यादें  आशीष कहीं पर घर में हो

शहर की बहर

लौट आयी हैं कहीं फिर  वो खामोश शहर की बहर भिगोता है कोई नैपथ्य से  साथ लिए बरसात की लहर  किताबों के सूखे फूलों पर  वो ख़ुशबू  आयी है निखर  लिखता है कोई चुपके से साथ लिए यादों का असर रास्तों मे बिखरी शामों पर  परछाईं फैला चुकी है क़हर   हवा में उड़ी है आशाये तबसे तेरे लौटने के हर  पहर पर 

मनिहार

संवेदनाओं के सूनेपन में खुशी के गीत- ग़ज़लों का  प्रकृति के रंगों में पला-बढ़ा  मैं मनिहार सपनों का  आशाओं के फैले सागर में कमल की कोमल कुमदिनीयों सा  आस की कोंपल खिलाता हुआ मैं मनिहार सपनों का  बुग्यालो की लहराती घास में ख़ुशबू की फैली बयार का  अस्तित्व की तलाश मे भटकता मै मनिहार सपनों का  धर्म जात के भेदभावी गाँव में एकजुटता की अनदेखी आस का ख़ुशियों की गठरी थामें हुआ  मैं मनिहार सपनों को समाया बच्चों की मुस्कुराहटो में ख़ानाबदोश मंज़िलों की तलाश का  अपने हर ग़म को छुपाता हुआ मैं मनिहार सपनों का 

तलाश में

वक़्त ठहरता तो पूछता क्यो हड़बड़ी में रहता है  दौड़ना तो सबको था  मंज़िलों की तलाश में  मन पढ़ता तो पूछता  किताब मे लिखा क्या है  खोजना तो सबको था पाने की तलाश में बहता साथ तो पूछता  किनारे पर रखा क्या है  तैरना  तो सबको था पार पाने की तलाश में 

यादों मे पलता

फैली है उसकी यादें इस क़दर  मेरी कविता की किताबों पर  यूँ तो साथ चलती हैं, मिलती नही कुछ पन्नों का फ़ासला हमेशा रहा  यादें तो हैं पर शिकायतें नही कोई  मसरुफियत में हर कोई रहता है मगर मनों मे साथ चलता है एकाकी जीवन यूँ कुछ सासों का फ़ासला हमेशा रहा  वो दौर और था जब सजदे ना-गवारां रहे वैसे वो खुदा का बन्दा जुदा भी न था  दूरियाँ तय कर ली हैं मंज़िलों ने बहुत  यादों मे पलता एक फसाना हमेशा रहा 

बयार

हिमालय की पिघलती बर्फ बनकर बहती धरा सृष्टि में जीवन देने वाली हर बयार को जगा जाती है झुरमुटों में चहकती आवाज़ मन पर दस्तक देकर स्नेह को झकझोर करने वाले हर अहसास जगा जाती है अकेली शामों का सूनापन अँधियारों को चीरता हुआ ख्यालो में अवतरित होने वाली हर शंकाओ को मार जाता है 

कोई टूटता तारा

मन्नतों के आसमान पर कोई टूटता तारा मन से निकलने वाली हर दुआ को जगा जाता है कंकरीली बंजर जमीन पर कोई  उगता बीज संघर्षो के जीवन वाली हर आस को जगा जाता है इतिहास के पन्नो पर कोई भूली बिसरी तारीख समय  को छोड़कर जाने वाली हर याद को जगा जाती है