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बात

बात स्नेह की कब थी  सम्मानों की थी  मनाना किसने चाहा था  बात,बात की थी  फ़ासलों में रहना या  फ़ैसला करने की थी  बात साथ चलने की कब थी  निभाने की थी   बात देखने की कब थी नज़ाकत क़दमों मे थी दायरे तो पहले से थे  दूरियाँ बढ़ाने की कब थी  गुमशुम थे सब नाराज जताने की कब थी  बात पाने की थी ही नही खोकर भूलने की न थी

मैं पत्थर था

जानता था वो नदी सा था उमड़ घुमड़कर आया था खड़ा रहा मैं पत्थर था नदी होता तो बह जाता किनारे कब बचे वेग था अवसादों का  साथ था हिला नहीं मैं पत्थर था मिट्टी होता तो बह जाता बहना था जिसे वो बह गया तू भी रंगो में रंग गया खिसका नहीं मैं पत्थर था रंग होता तो बह जाता 

तुम्हे क्यों याद होगा

तुम्हे क्यों याद होगा वो तेरे दोस्तों के जालें वो मनों के बीच की दूरी वो सूखे दिन की बरसातें वो सर्दी की गरम बातें तुम्हे क्यों याद होगा वो ज़माने में तेरी बातें वो हर दिन की रुसवाईयाँ वो लोगो से नजदीकियां और मुझसे दो गज़ की दूरी तुम्हे क्यों याद होगा वो मेरे घर के कोने में दुबककर बैठी ख़ामोशी वो राहों में बिखरी हुई अनगिनत स्नेह की यादें तुम्हे क्यों याद होगा 

गुजरे साल

ठहरा हूँ वहाँ जहाँ छोड़ चला था यादों के ख़ाली नीड़ों को सुबह की खुलती आँखो ने शामों  के मंजर दोहराये पाता हूँ वहाँ जहाँ छोड़ चला था हाथों की सूनी सांसो को आँखों से जो बह नहीं पाया मन ने वो मंजर दोहराये देखा है वहाँ जहाँ छोड़ चला था। भूले रिश्तों की कसक रही है गुजरे सालों के कोनों पर खोने की एक पीड़ रही है

शून्य

शून्य सी  पहचान ओढ़े  टटोलता हूँ जब खालीपन को  कुछ ख़त्म हुई डायरियों पर   घिसे हुए कलम की नोक से  पन्नो पर घूरते कुछ शब्द  अनायास कहने की ताक में  खामोश गुनगुनाते हैं  शून्य से सफर पर  दौड़ता हूँ जब पाने की होड़ में कुछ ख़त्म हुए रास्तों पर  धीमे से कदमो की आहट से  झुकी थमी सी कोई नज़र  शिकायतें करती सी लगी  खामोश ताकते हुए 

वो

लौट के कब  आते हैं जाने वाले जो चले गये वो लाम पर हैं  फूलों के दस्ते  वाले और हैं  हम अब भी  वहम पाले बैठे हैं 

मनगीत

मन ने जो गुनगुनाया वो मनमीत है जो खरा सा लगा वोही मनगीत  है प्रीत संगीत था याद रख ना सका यूँ  धुनों से भुलाया गया ना कभी बात ने जो  कहा भावनाएं रही जो बचा सा रहा राह मै खो गया टीस दर्दो में है सह सका हूँ अभी यूँ तेरे लौट जाने की उम्मीदें नहीं कर्म को फर्ज जाना सफलता नहीं भेद अपना छुपाना न आया कभी रास्तों में यूहीं सब बिखरता रहा यूँ तो मानक गड़ाए नहीं हैं कभी 

हाथ

जो पकड़े छूऐ  कभी नही  जो मिले कभी तो डरे लगे  वो उन हाथों का  जादू था जो साँसों में ही  बहा सदा  जो उठे नही  कभी हिले नही  नही पास बुलाया  दूर रहे  वो उन हाथों  का जादू था  जो लकीरों में  कभी था ही नही

तेरी तरह

तेरी तरह मन की बातों को  मन में रखना नही आता  तेरी तरह आहत मन को आँसुओं में बहाना नही आता तेरी तरह सपनों को सजाते हुए  डरना भी नही आता  तभी तो कहता हूँ  हाँ मुझे स्नेह है .... तेरी तरह तोल मोल कर कहना नही आता  तेरी तरह रास्तों से अचानक पलटना नही आता तेरा तरह नज़रें झुकाकर  उठाना नही आता  यूँही बेबाक़ हूँ कि हाँ मुझे स्नेह है  तेरी तरह उसूलों मे  बँधना नही आता  तेरी तरह प्रश्नों  पर चुप रहना नही आता  तेरी तरह जज़्बातों को छुपाना  नही आता  यही स्वीकारोक्ति है हाँ मुझे स्नेह हैं ..... 

तेरे बिन

तु जानता सब है कहाँ छुपी है चौखट की कुंजी की चाबी  मन की ख़ुशियों के दरवाज़े  तेरे बिन जो खुले नही हैं  तु जानता सब है कहॉं भरी है  यादों की रद्दी की बोरी  बहती आँखों के तहख़ाने  तेरे बिन कुछ कही नही है  तु जानता सब है कहॉं रखी है  खाली मन की भरी पोटली  सूने मन की गहराई में  तेरे बिन कुछ जँचीं नही है