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बाबा

बाबा मैं तुम जैसा ना हो पाया त्याग समर्पण जीवन दर्शन सफर शून्य अविवेक अकिंचन  कोशिश की न कर पाया  बाबा मैं तुम जैसा ना हो पाया बच्चों का आदर्श न बन पाया बीबी की शान न बन पाया  मानक नही किये स्थापित  सपनों को न सजा पाया  बाबा मैं तुम जैसा ना हो पाया खुद से भी न लड़ पाया  जीवन की ड़ोर न कस पाया सार्थक कर्म दिशाहीन रहे सच का साथ न दे पाया बाबा मैं तुम जैसा ना हो पाया

मन के पार

पहले मन के पार गयी फिर सपने सजा गयी मेरी बनकर मुझसे लिपटी नजर मिलाकर चली गयी घर की देहरी सजी मिली आंगन छज्जा धुला मिला कोने बैठें बाटी खुशियां  हाथ मिलाकर चली गयी चेहरे बोल रहे अपनापन मन की धड़कन तेज रही घबराई थी सांसे लेकिन गले मिलाकर चली गयी सुर्ख हुए होठों की भाषा छूकर स्नेह उड़ेल गयी देकर अपना मनतन सब मुझे जीतकर चली गयी

निशां

गहराती एक इबारत को एक नया अंजाम दे आया मैं मन को छोड़ आया हूँ और खुशबू संग लाया हूँ अधूरी सांस रख दी थी उत्ताप धड़कते सीने पर समेटी पखुड़ियां कोमल  और निशान संग लाया हूँ घरों को एक कर बैठै कोने अहसास रख आया लगाया है गले उसको और यादें सग लाया हूँ

ठहर जा साथ

 समर्पण है तेरा मुझको  मैं संकल्पो से बँध आया  तु नदिया साथ बहती सी  मैं समुन्दर ठौर कर आया  ठहर जा साथ तु कुछ पल को तो मेरे   मैं दरिया पार करके  ही निकल जाऊँ चाहत है तेरी मुझको  मैं भरोसे बाँध आया हूँ  तु मंजिल साथ रहती सी  मैं सफर में कौल कर आया  ठहर जा साथ तु कुछ पल को तो मेरे   मैं पताका पीट करके ही निकल जाऊ  उम्मीदें हैं बंधी तुझसे  मैं रातों जाग आया हूँ  तु उजाला शाम जगमग है  मैं अँधेरा चिर कर आया  ठहर जा साथ तु कुछ पल को तो मेरे   मैं जीवन जीत करके ही निकल जाऊ 

हर घडी

 तु शाँति में तु शोर में  तु मौन में अलाप में  हर समय की सीख में  तु हर घडी उम्मीद में  ध्यान मन का तुझसे है  सहजता तेरे नाम से  हर समय की दौड़ में  तु हर घडी संकल्प में  तु भोर में तु रात में  तु दिन चढ़ी सी धूप में  हर समय की रेत में  तु हर घडी है साँस में  परिपक्वता तु काम की  सम्पूर्णता तेरे जाप  से  हर समय की ओट में  तु हर घडी विश्वास में  तु बोल में तु भाव में  तु शब्द सागर नाम में  हर समय की जोत तुझसे   तु हर घडी अहसास में  जो रही खाली हथेली  रेखाएं तेरे नाम की  हर समय का संग तुझसे  तु हर घडी विश्राम में 

तेरा होना

 कोई अदृश्य है मेरा  जो तुझ तक बांध जाता है  तेरा होना तुझे पाना  ये आशीषों का मुक्कदर है  कोई रहता है संग मेरे  जो तुझ तक ले ही जाता है  तेरा होना तुझे पाना  ये सोचों से भी बढ़कर है  कोई सपना अधूरा सा  जो तुझ तक पूर्ण होता है  तेरा होना तुझे पाना  ये कर्मो की इबारत है  कोई मांगी दुआ मेरी  जो तेरे दर तक जाती है  तेरा होना तुझे पाना  ये विश्वासों की ईमारत है  सफर में साथ दे साथी  सफर की लाख उम्मीदें  तेरा होना तुझे पाना  सफर की एक मंजिल है 

कार्य क्षेत्र

 यहीं तक सफर साथ सीखे हुए  यहीं तक सफर साथ सम्मान के  सदियों चला है सदियों चलेगा  ये कार्यों के क्षेत्रों के रिश्ते अनोखे  यहीं तक सफर साथ बसते हुए  यही तक सफर साथ बढ़ते हुए  सदियों खींची है वो रेखा परस्पर  ये कार्यों के क्षेत्रों के रिश्ते अनोखे  जहां है खुला के विस्तृत मगर   सिमित रहे दायरों में सदा  सदियों रही एक बढ़ने की कोशिश  ये कार्यों के क्षेत्रों के रिश्ते अनोखे   सफर दर सफर ख़त्म होता नहीं  कदम दर कदम साथ चलता नहीं  सदियों खींची है वो सीमा परस्पर  ये कार्यों के क्षेत्रों के रिश्ते अनोखे 

अनवरत रहेगा

मैं नही जानता राह किधर है मंजिल मुझको मिल पायेगी कदम बढाऊगा मैं साथी सफर मेरा अनवरत रहेगा  मै नही जानता सीमाओं पर खुशियों की तामिर मिलेगी  सपने सजाऊंगा मैं साथी संकल्प मेरा अनवरत रहेगा मैं नही जानता विश्वासों पर तुलना की टीकी दिवार मिलेगी नीव रखूँगा सदा मै साथी  संघर्ष  मेरा अनवरत रहेगा मै नही मानता जीवन मेरा तुझसे आगे बढ पायेगा फिर भी लूंगा सांस मै साथी स्नेह  मेरा अनवरत रहेगा

स्नेह सदा

जब भी कभी दुनियां हावी जब निष्कर्ष नही मिल पाता है स्नेह सदा ठुकराता है  तु मुझे हांसिये पर लाता है ।। जब भी कभी सघर्ष तेरे जब त्याग नही भूल पाता है  स्नेह सदा अजमाता है  तु  मुझे प्रश्नों में लाता है ।। जब भी कभी डर लगता है जब रिश्ता कुछ न बन पाता है स्नेह सदा रूलाता है  तु मुझे भूल सा जाता है ।। जब भी कभी मिलना होता है जब आगे मार्ग नही बन पाता है स्नेह सदा दोयम होता है तु मुझे रोक सा जाता है ।। जब भी सदा जीता अपनों को जब खुद के लिए हंसना नही बनता स्नेह सदा ड़र सा जाता है तु मुझे इशारा दे जाता है।। जब भी कभी सब मन आता है जब खुद को खुद में खो देता हूँ स्नेह सदा सहम जाता है  तु मझे और याद आ जाता है ।।

रौशनी से नहाया

 आशाओं की किरण  अब धुधलती सी  नज़र आती है मुझे  वो मेरे अंधेरों का  जगमग चेहरा आज  रौशनी से नहाया है  विश्वासों की डोर  अब सुदृढ़ सी  लग  जाती है  वो मेरे मन के    भीतर दबा दीप बाँहों को फैलता है  अहसास मानों का  एक तार जोड़कर  करीब सा लगता है  वो उसके लबों में  छुपा एक नाम  चेहरे पर पढ़ा जाता है