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ख़ैरियत

दो बातें ख़ैरियत की पूछता हूँ चुपके से ये नही कि तु जबाब दे ये कि तु अलग है सबसे   न यादों के पंख होते हैं न हर मंज़िल का मकां है ये नही कि तुझे पाना है ये कि तुझे खोना नही है  भूलने को सब विवाद हैं किसी के बिछायें जाल हैं  रिश्तों की लिखापढ़ी नहीं ये मन की एक इबारत है 

लम्हों की मुढेंर

उन लम्हों की मुढेंरों पर  बिखरा रहा कुछ यूँही  वो लजाकर मेज़ पर पसर गया था कभी  उन दिवारों के उंचाईयो पर अटका रहा कुछ यूँही  वो ठिठकर भी जिद कर  फिर उड़ चला था कभी  रंगीन सपनों के ‘पोस्टरों’ पर  सफ़ेद रहा उसका रंग यूँही  वो अदृश्य सी छाप देकर  दूराहे पर छोड़ गया था कभी  

जीवन की पंगते

डगर मंज़िलों की यूँ दुश्वार भी नही  कोई राह दिखा गया कोई साथ चल दिया जीवन की पंगतो पर भावनाओ के अहसास ख़ाली हो भी जाय तो क्या निशाँ  बाक़ी रह ही जाते हैं  ज़मीं से जुड़ी जड़ो पर असमय  तीखे प्रहार  असर कर भी जाय तो क्या पेड़ उगना भूल नही जाते 

वो रंग बेरंग

रंग जीवन में भरती रही  वो जो बेरगं रही  तस्वीरें मन में  सूनसान राहों में गीत गाती रही वो जो बिखरी रही आशायें घर में हँसी लबों पे बिखेरती रही  वो पडी रही  यादें कोनों मे

वो शाम ढली नही

वो सूखी नदियाँ  बहती तो नही देखी आस के कुछ बीज उगते जरुर देखे  पछवा चली कभी  कभी पूरवैयां  चली  सुखाती फ़सल देखी  जगाती ख़ुशबू बहीं  न जीतना चाहा न मन हार पाया कोशिशों के आसमां की  शाम कभी ढली नही 

ये पहेली हल हो जाएगी

हर माहौल में याद रहेगा अहसास तुम्हारे होने का तुमको पा जाने का सुख और दर्द तुम्हारे खोने का शीत पहाड़ी सुबहों मे वो हाथ हाथ मे याद रहा ठंड मे उलझे होंठों मै तेरा नाम हमेशा याद रहा कहनी थी दो बाते तुझसे तो शंका ख़त्म हो जाएगी स्नेह रहा या आकर्षण सब दुविधा हल हो जाएगी ठूंठ खड़ी सी आशाओं मै एक बेल लपेटे बढ़ती हैं तुम और मै ही दूर दूर हैं बाकि दुनिया अपनी है सीना अपना छलनी होगा सांसे सब थम जाएँगी जीवित हूँ  या नश्वर हूँ ये पहेली हल हो जाएगी 

चल मन! दूर कहीं

वो जो  सिखा गया खुद उसे याद नहीं है समय के थपेड़ों में वक्त किसी के पास नहीं है जो मनशक्ति सीखा गया वो ऊर्जा झूठ नहीं है शून्य के बाज़ारों में अहसास किसी के पास नहीं है जो सूर्य सा चमक गया वो परछाई में साथ नहीं है अकेलेपन के विचारों में झूठी स्वांतना किसी के पास नहीं है आंधियों में ख़ामोशी जाता गया सांसो का वो बंधन साथ नहीं है चल मन! दूर कहीं पहाड़ो पर हिमालय सी शांति यहॉं नहीं है

सजता कब है

शाम कभी उन राहों पर नज़र तांकती रहती थी  हवा कभी उन राहों  की छूकर चुपके बह जाती थी  झुरमुट के कोने पर कोई चाँद निकलता रहता था  सरपट दौड़ लगाती आशा कोई मन अधीर रह जाता था  शाम सुहानी बंजर होती धरती आस जगाती कब है मन मन्दिर का कोई कोना  श्याम रंग से सजता कब हैं 

कब

हिमालय मुझको कब होना था! रावण सा बाँहें फैलाकर  सारा जग जीतना कहाँ था! शबरी के झूठे बैरों सा   जटायु के कटे पंखों सा  सहृदय निश्चय त्याग कर सकूँ  लक्ष्मण रेखा पार करना कब था 

बिना किसी

जो गुथां रहा धागे में पिरोया रहा एक कड़ी में  मज़बूती से विश्वास डटा रहा माला के फूल और मोती  यूँहीं बिना किसी आधार जुड़े नही रहते   जो सदैव सोच में बना रहा  गीत ग़ज़लों की लड़ी बनकर  सहूर से स्नेह बना रहा  जुड़ाव की आस और याद यूँही  बिना किसी अपनेपन के जुड़ी नही रहती