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शून्य

शून्य सी  पहचान ओढ़े  टटोलता हूँ जब खालीपन को  कुछ ख़त्म हुई डायरियों पर   घिसे हुए कलम की नोक से  पन्नो पर घूरते कुछ शब्द  अनायास कहने की ताक में  खामोश गुनगुनाते हैं  शून्य से सफर पर  दौड़ता हूँ जब पाने की होड़ में कुछ ख़त्म हुए रास्तों पर  धीमे से कदमो की आहट से  झुकी थमी सी कोई नज़र  शिकायतें करती सी लगी  खामोश ताकते हुए 

वो

लौट के कब  आते हैं जाने वाले जो चले गये वो लाम पर हैं  फूलों के दस्ते  वाले और हैं  हम अब भी  वहम पाले बैठे हैं 

मनगीत

मन ने जो गुनगुनाया वो मनमीत है जो खरा सा लगा वोही मनगीत  है प्रीत संगीत था याद रख ना सका यूँ  धुनों से भुलाया गया ना कभी बात ने जो  कहा भावनाएं रही जो बचा सा रहा राह मै खो गया टीस दर्दो में है सह सका हूँ अभी यूँ तेरे लौट जाने की उम्मीदें नहीं कर्म को फर्ज जाना सफलता नहीं भेद अपना छुपाना न आया कभी रास्तों में यूहीं सब बिखरता रहा यूँ तो मानक गड़ाए नहीं हैं कभी 

हाथ

जो पकड़े छूऐ  कभी नही  जो मिले कभी तो डरे लगे  वो उन हाथों का  जादू था जो साँसों में ही  बहा सदा  जो उठे नही  कभी हिले नही  नही पास बुलाया  दूर रहे  वो उन हाथों  का जादू था  जो लकीरों में  कभी था ही नही

तेरी तरह

तेरी तरह मन की बातों को  मन में रखना नही आता  तेरी तरह आहत मन को आँसुओं में बहाना नही आता तेरी तरह सपनों को सजाते हुए  डरना भी नही आता  तभी तो कहता हूँ  हाँ मुझे स्नेह है .... तेरी तरह तोल मोल कर कहना नही आता  तेरी तरह रास्तों से अचानक पलटना नही आता तेरा तरह नज़रें झुकाकर  उठाना नही आता  यूँही बेबाक़ हूँ कि हाँ मुझे स्नेह है  तेरी तरह उसूलों मे  बँधना नही आता  तेरी तरह प्रश्नों  पर चुप रहना नही आता  तेरी तरह जज़्बातों को छुपाना  नही आता  यही स्वीकारोक्ति है हाँ मुझे स्नेह हैं ..... 

तेरे बिन

तु जानता सब है कहाँ छुपी है चौखट की कुंजी की चाबी  मन की ख़ुशियों के दरवाज़े  तेरे बिन जो खुले नही हैं  तु जानता सब है कहॉं भरी है  यादों की रद्दी की बोरी  बहती आँखों के तहख़ाने  तेरे बिन कुछ कही नही है  तु जानता सब है कहॉं रखी है  खाली मन की भरी पोटली  सूने मन की गहराई में  तेरे बिन कुछ जँचीं नही है 

कुछ भी नही

कब भीड़ खड़ी करनी थी   कब वो मक़ाम छूनें थे विस्तार जीवन का इतना हो स्नेह की छोटी सी क़तार हो  और तु उसमें शामिल हो  कब आवाज लगानी थी  कब आँखों में रहना था  देखना दूरियों मे इतना हो  कि मीलों नज़र जायें  और वहाँ बस तु ही शामिल हो कब पा लेना  है सबकुछ कब दुनियाँ में घूम जाना था इतनी उम्मीदों की ज़मीं रहे  कि बस खो जाय कुछ तो उस खोने में तु शामिल न हो 

शाम लगी है

जब भी बादल घिर आये हैं यादों के मंजर लौटे हैं बरखा की बूंदें तरसाती तेरे जैसी शाम लगी है अब भी पंख पखेरू चुप थे अलसायी बेलों के नीचे चिड़ियों ने चहचाना छोड़ा कोलाहल सी शाम लगी है जब वो उत्स गिरे थे धरा पर निष्ठुर मन पर चोट लगी हैं नदियों ने बहना तब छोड़ा हिमगिरि पर जब शाम लगी है

तु मुडा ही नही

दायरों मे कहीं जब भी आया कोई मौन कहता गया सोच तुझ तक गयीं बीच खूँटे में लटका रहा दरबदर  मन का विश्वास है फिर भी थमता नही  ग़ैरों बनकर  कभी जब भी आवाज दी  मौन लिखता रहा याद तुझ तक गयीं अंगुलियों के निशाँ यूँ मिटता  रहा  दौर यादों का  देखा तो  थमता नही खाली कोनों से किसने नज़र फैर दी यूँ लगा पास से कोई गुज़रा सही  असर झुकती आँखों  बढ़ता गया  दूर जब से गया तु मुडा ही नही 

कशमकश

ज़मीं में धँस जाऊँ या की उग आऊँ  कशमकश है जीवन, कोशिशें कब हारी हैं खुद से संघर्ष करूँ या दूर भाग जाऊ  कश्मकश है जीवन, लडना कब मना है बढता, दौड़ता रहूँ या कि थम जाऊँ  कशमकश है जीवन, सोच कब रुकी हैं  चाहूँ न चाहूँ या कि विरक्त हो जाऊ कशमकश है जीवन, समर्पण कब हारा है रिश्ते हो न हो या कि एकाकी रहूँ  कशमकश है जीवन, स्नेह कब भूला है