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तेरी तरह

कभी सोचता हूँ तुझसे मिलकर तेरी सारी शिकायतें कर डालूँ छुप जाऊँ  तुझमे  कहीं और फिर मैं खो जाऊँ  कभी सोचता हूँ तुझे लिखकर  सारे अरमान कह डालूँ पत्थरो पर उकेरु कहीं  फिर कलम तोड़ डालूँ  कभी सोचता हो तुझे भूलकर  दुनिया वीरान कर जाऊँ  आस के बीज बोयूं  और तेरी तरह भूल जाऊँ 

तु नादां

पहले तो सादगी ने लुभाया हमें  फिर सच से चेहरे यूँ बहकाया हमें स्नेह का रोग मन  को न था एक नादां ने अब ये सिखाया हमें  पहले नज़रें झुकाकर बुलाया हमें  फिर दोस्तों की जहालत बनाया हमें सच से जीने का हुनर तो पता था हमें झूठ को पर लगाना  सिखाया हमें  पहले अंजान अपनापन दिखाया हमें  फिर दूरियों को परिभाषित कराया हमें साथ रहने की क़समें न खायी मगर साथ रहना अकेले में सिखाया हमें 

मानता कब है

कश्तियाँ बहा ले गए वो तूफां और थे  गरज गए जो बदरा वो बरसते कब हैं लौटकर आना पड़े समुन्दर की सीमा है  वरना पंछी को उड़ने की मनाही कब है तोड़कर बंदिशें आसमा में फ़ैल सकता है  संस्कारो में खड़ा पेड़ खुला बादल कब है  अपना हो नहीं सकता वो अपना लगता क्यूँ है  मन जानता सब है पर मानता कब है 

जब भी लगा

सहरा से निर्जन विस्तार पर यूँ लगा कमल सा खिल आया दो शब्द किसी ने लिख भेजे जब भी लगा वो भूल गया  पहाड़ों की शीतल चोटी पर  यूँ लगा तरूण मृग चल आया ऑंखों की पलकी झपकी है  जब भी लगा वो भूल गया  जंगल की घनी झाड़ियों से यूँ लगा पंछी कोई उड़ आया साँस की जिजीविषा लौटी है जब भी लगा वो भूल गया 

याद आयेगा

कभी अन्जान राहों का बटोही याद आयेगा कहीं ठुकरा दिया कोई वो पत्थर याद आयेगा ज़माने भर में घूमोगे वो मंज़र याद आयेगा कही कोने में सीमटा वो फसाना याद आयेगा  कही चुपचाप ढलता सा वो सूरज याद आयेगा  कहीं बदला मुडा कोई कदम फिर डगमगायेगा  बजार-ओ भर में घूमोगे वो ख़ालीपन सतायेगा कभी सूनसान राहों पर वो दस्तक याद आयेगा  कही टूटे मकामों का वो खंडहर याद आयेगा  कहीं सूने पड़े मन का बबंडर याद आयेगा  थककर हार बैठोगे निगाहों को भरम होगा  कभी गुमनाम क़दमों का वो चेहरा याद आयेगा 

अक्सर

ये सोचा कब था कि साथ हो  सामानांतर बह जाने कि ख्वाइशें अक्सर डुबो ही देती हैं उफनती नदी के वेग में  ये कब था कि पूजी जाय हर मूर्ति  पत्थरों को बोलते हुए देखने कि ख्वाइशें  अक्सर पत्थर बना ही देती हैं  भावनाओं के उदगार में  ये कब था कि पा लूँ सब कुछ  एकतरफा त्याग अपनाने की ख्वाइशें  अक्सर वैरागी बना ही देती हैं  समर्पण के सदभाव में 

हारा सा लगता हूँ

सफर पर विराम मिले  अब थका सा लगता हूँ  जी लूँ कुछ यथार्थ  वरना हारा सा लगता हूँ  जो गिने गए अपनों में  क्यों वीराने से लगते हैं कहना था सब कुछ जिनसे  वो गुमशुम से लगते हैं  राह अकेली राही था  साथ न तेरा माँगा था  साथ मिला जिनका पलभर  सब खोये से लगते हैं  जग से हारा हार न माना खुद से हारु ये डर है मानक शर्तें मुझ तक हैँ सब मुझे निभाने दे साथी !

यथार्थ

चल मन उतर आ कल्पना की दीवारों से यथार्थ की धरती पर छालें बहुत हैं  कल्पना के कोरे काग़ज़ों  के चित्र  बेरंग और और अमूर्त बहुत है 

खिसकती रेत

जो भूला सा लगा हरदम  उसे दोहरा गया हूँ  खिसकती रेत में फिर से  सपनों को सज़ाता हूँ  जो छूटा सा लगा हरदम  उसे पाता न खोता हूँ  उफनती क्षीर में फिर से  सपनों को तैराता हूँ  जो ग़ैरों सा रहा हरदम उसे मन में सजाया हूँ  धधकती आग में फिर से  ख़्वाबों को जलाता हूँ  जो भूला सा रहा हरदम उसे दिन दिन मैं गिनता हूँ  असंख्यित स्वर्ग में फिर से अंधेरों को भगाता हूँ 

भूला नही

हर सफ़र मे छांव कब है हर तलाश की मंज़िल नही  किसी को कुछ याद नही  कोई कुछ भुला नही  हर झरने पर प्यास कब है रेगिस्तां आँखों में पानी नही  कोई दो कदम साथ चला नही कोई दो कदम भूला नही  हर ख़ामोशी चुप कब है  मन का बबंडर शान्त नही  कोई आवाज देता नही कोई चुप्पी भूला नही  हर स्नेह स्पष्ट कब है हर शब्द बाहर निकला नही  कोई ग़ुस्सा आँसू में बहा गया  कोई आँसू को कभी भूला नही