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रिश्तों की मर्यादा

 तु शबरी के झूठे बेरों सा अब मन को  भाया है  पाषाण हुए इस मन को तूने स्पर्शों से जगाया है  ज्ञान का तुलसी बीज रहा तु बरसों में उग आया है  तु पदचापों का शासन है विश्वासों की मर्यादा है  धनुरेखा का त्याग समर्पण वैदेही सी परीक्षा है  चीरहरण की साड़ी सा तु सर्वस्व लुटाता अर्पण है  चक्र कटी अंगुली का वो मौन सदा दोहराया है   अतिपीड़ा में चक्रव्यूह की आतुर एक प्रतिज्ञा है  तु आँख खोलती बरसों का तप रिश्तों की मर्यादा है  तीरों की शैया पर लेटा भीष्म विजय की संकल्पना है  गोकुल को एक सार सिखाता मुरली की शैतानी है  आन बान मर्यादा वाली धाम ब्रज की राधारानी है  भोजराज के मीरा सी तु कृष्ण समर्पित प्रतिभागी है  तु स्नेह तरसती मन आलिंगन त्यागों की मर्यादा है  मन की किसी दबी आस पर कर्म सिखाता पीपल है 

चलो बाँटे बराबर

 वो लिखता है पढ़ता है वो खोया सा रहता है  बंधा मुझसे वो डोरी में खींचता पास आता है  रही नाराजगी जग से वो मुझको डाँट देता है  वो कहता है चलो बातें नहीं करनी हमें तुझसे  चुप रहता है गुमशुम वो जरा सहमा सा रहता है  हजारों बात मन में है कहना मुझसे चाहता है  कहता है चलो बाँटे बराबर हिसाब रखता है  वो कहता चलो साँझा नहीं करना हमें तुझसे  सजता है संवारता है वो चुपके से तकता है  जुबां पर बात है लेकिन वो खामोश रहता है  कहता है चले जाओ पर अधिकार रखता है  वो कहता है नहीं रखना कोई रिश्ता हमें तुझसे जो जगता था दिनों में वो अब रातों को जगता है आँखे बोलती  सबकुछ वो चेहरा शांत रखता है  कहता है चलो सो जाओ खुद जागा सा रहता है   वो कहता है चलो बातें नहीं करनी हमें तुझसे

सहृदय ही रहा

 भावनाएँ कभी तोली जाती नहीं  विरह गीत तो  गुनगुनाया नहीं  मन ने मन की सुनी मन से ही कहा  मन ने जो भी कहा वो तो सच ही लगा   भेद करना कभी रास आया नहीं  पीड़ा को कभी गुनगुनाया नहीं  मन ने सोचा जिसे उससे ही कहा  उसने जो भी कहा वो तो अपना लगा  तोडना तो कभी रास आया नहीं  मन के विश्वास को डगमगाया नहीं   मन ने  जोड़ा जिसे मन मैं ही रहा  उसने माना न माना वो सहृदय ही रहा 

मन रे !

 ये जो मिलन हुआ मन रे !  मन बीच बसा तब से  लदे भरे सामान  थकी सी वो मुस्कान  सपने संग खुशियाँ और खाली सा मकान ये जो मिलन हुआ मन रे !  मन बीच बसा तब से  बंद पड़े वो  द्वार  साथी भी नहीं कोई पास  नयी सी एक दुनियां  और सुबह सबेरे काम  ये जो मिलन हुआ मन रे !  मन बीच बसा तब से  झुकी रही नजरें  गंभीर किये जो सवाल  नए से लोगों में  दोस्तों का पैगाम  ये जो मिलन हुआ मन रे !  मन बीच बसा तब से  दो पल की खुशियाँ  घंटो भर ताकना  नाराज कभी होना  फिर चुप के हंस लेना  ये जो मिलन हुआ मन रे !  मन बीच बसा तब से  मन बीच पड़े होना  चुपचाप चले जाना  सांसो का मिलना  फिर बाँहों में  भरना  ये जो मिलन हुआ मन रे !  मन बीच बसा तब से 

तेरी मेरी

  उससे और खुद से भी शिकायतें तो बहुत हैं  आज जो कहता है चल जी ले अपनी जिंदगी   टूटी थी ये आस भी बिखरा था एक ख्वाब सा  शहर भी  तेरा ही था तेरी रही अदालतें  रोकता तु दो-घडी पूछता सवाल भी  आज जो कहता है चल तु कभी मुडा नहीं  रोया था ये मन कभी लूटा था वो अमन मेरा नज़र भी तेरी ही थी तेरी रही शिकायतें  एक पल तेरे बिना सूझता था दिन नहीं  आज जो कहता है चल तु कभी रुका नहीं  खोया था चैन भी उडी वह नीड थी मेरी  हक़ भी तो तेरा ही था तेरी रही नवाज़िशें।।। 

समय तो लगेगा

  एक नए रास्ते पर चली है नदी  कुछ समय तो लगेगा इस प्रवाह पर  काटकर तटबंध तोड़े तो हैं कुछ समय तो लगेगा उस गंतव्य तक  एक मन जो सदा जीता अपनों को  रहा  कुछ समय तो लगेगा खुद के जीने लिए  बांधकर तो रखा मन उड़ने को है कुछ समय तो लगेगा इस पहचान पर  एक कण जो रहा लाख भ्रांतियां लिए  कुछ समय तो लगेगा उस संदेह पर  जोड़कर पुल मनों के सजेंगे तो हैं  कुछ समय तो लगेगा इस अवरोध पर।।।। 

आज खुलकर

 अश्क आखों से बहे जिसके  हमारी खातिर  वो जो चुपके से कभी छोड़ गया था हमको  वो जिससे कहने की हर वजह छुपाई हमने  आज खुलकर मैं लिखता भी हूँ कहता भी हूँ  तु ही मन है तु ही रब है तु एक दबी सी ख्वाईश तु ही हर गीत में ग़ज़लों में समायी ख्वाईश  वो जो छंदों की आवली सी बनायीं हमने   आज खुलकर मैं मानता भी हूँ जताता भी हूँ  तुझे पूजूँ तुझे पाऊँ तु एक मांगी सी इबारत  तु ही हर दुआ में आरजू में समायी इबारत  वो जो रिश्तों का एक सम्बन्ध जुड़ा है तुझसे  आज खुलकर मैं अपनाता भी हूँ निभाता भी हूँ 

जताता नहीं

 मैं जगाने लगा उसको जिद में मेरी  हर पहर जो बंधा एक सीमा मै था  बांटते बांटते रुक ही जाता है वो  मानता है जरा पर जताता नहीं  मै कहने लगा अति की सीमा मेरी  थोड़ा चुप सा रहा मुस्कुराता लगा  लिखते लिखते जरा रुक ही जाता है वो  चाहता है जरा पर जताता नहीं  मैं सताने लगा और शरारतें मेरी  थोड़ा हंस सा गया और सहता लगा  कहते कहते जरा रुक ही जाता है वो  सुनता है जरा पर जताता नहीं  जानता हूँ सभी सीमाएं तेरी  तोड़े बंधन नहीं जाते हैं कभी  बात की बात हो तो गले मिल भी लें  बढ़ता है जरा पर जताता नहीं  ऊँचे बढ़ते रहें हो वो मंजिल तेरी  राहें हों  संग संग चल भी तो अभी  हाथ मै हाथ दे दो कदम चला है वो  भरोशा भी है  पर जताता नहीं 

निर्झर मन थी

  वो जो गुमशुम रहा है सदियों भर  जाने क्यों  रंग दिखाई न दिया  वो धवल श्वेत निर्झर मन थी  मैं कहाँ रंग चढ़ाता सा रहा  वो जो जरीदारी रही मन पर  जाने क्यों बंदिशें लगी हमको  वो सुगम मंद हवा मन की  मैं कहाँ रूप एक रमाता सा रहा   वो जो दरबान से रहे प्रीत पर  जाने क्यों हम समझ नहीं पाए  वो  सरल वास्ता था इस मन का  मैं कहाँ उल्टी डगर चलता ही रहा  वो जो अलग छाप थी मन पर  जाने क्यों हम गले लगा नहीं पाए  वो खड़ा था सीधे से उस रस्ते पर  मैं कहाँ चार पड़ाव रुकता ही रहा 

तु एक मन्दिर है

 ख्वाबों का एक मन्दिर है मूरत सी रखी तेरी उसमें उस नदी किनारे पीपल पर ओढ़ी है लाल चुनर मैंने  उन माँ के काले धागों को बांधा है नज़र बचाने तक  वो पीपल तेरा साया है वो धागे तेरे अस्क रहे  तु मन में रमाया है ऐसे बचपन की मीठी यादों सा  आ फूल कोई खिलता देखें वो भंवरा भर ले माचिस पर  चिड़ियों के चूजों को दाना और जुगुनू को आटा देदें  सरसों के पीले खेतों में चल ठोर ठिकाना यूँ कर लें जुगनू की चमक दिखी तुझमे फूलों सी वो एक कोमलता  उन लाखों सपनो के जैसा तु मिला है फिर इस जीवन में  आ स्वान को लेकर दौड़ चलें वो बछड़ा खोल लें खूटें पर  चल चढ़ें वो ऊँचीं डाल प्रिये और साथ तेरा ये निश्छल मन  सावन के झूलों पर झूलें और खो  जाएँ अपने सब गम  ऊँची डाल का सपना तु वो बछड़े सा थोड़ा नटखट  उन पावन सलोनी यादों को तु फिर लेकर आया जीवन में  तु पूछ लें तु कौन मेरा तेरा क्या छाप रहा इस जीवन पर  तु हार जीत से बढ़कर है  तु बचपन का हर एक स्वप्न मेरा  आ घुल मिल जा इस जीवन में खुशियों की 'डोज़' बढ़ा साथी  सब कुछ तुझसे माँगा है ...