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जीवन ये अभिशप्त

 मैं माटी में उपज न पाया  खाक भरी तक़दीर लिए  एक तूने है हसना सिखाया  बचपन झूला झूल गए  अब दो छोर खड़ी आशाएं  जीवन जीना भूल गए  कुछ तेरे दायित्व बड़े हैं  कुछ जीवन ये अभिशप्त प्रिये !! मैं ऊँचे शिखरों चढ़ न पाया  राख़ हुई उम्मीद लिए  एक तूने है बढ़ना सिखाया  संग तेरे हसना सिख गए  फिर तू थमता राह पुरानी जीवन जाने किस ओर बढ़ें  कुछ मुझसे लाख बड़े हैं रिश्ते  कुछ जीवन ये अभिशप्त प्रिये !!

बीज एक धरती

 चाँद पर टिकती नज़र  चाँद से ही दूरियां  जिंदगी में जिंदगी  ढूंढ़ता बरसों रहा  यूँ अमावस दूर तक  साथ ही चलता रहा  छोर पर छिटका मिला  वो चाँद अब भी दूर है  हो उजाला जग सदा  दीप तल हक़ हो मेरा  वो आरती सी रौशनी  मैं आखिरी पहुना खड़ा  है जरूरत साँस जो  पास आकर थम गया  साँस जब थमती लगे  हो साथ वो अपना खड़ा  हो हिमालय जग रचा  हिमनदी हक़ हो मेरा  वो हर तरफ हों फूल सा  मैं बीज एक धरती पड़ा 

मेरी एक दुनियां

 कभी बातों की खुशबू है  कभी सांसों की खुशबू है  तु हर पल मन में रहता है  तु गावों सी विरासत है  कभी संग बांध देता है  कभी संग छोड़ देता है  तु हर पल मन की चाहत है  तु गावों का हिमालय है  कभी बाहें पसारे है  कभी मुँह मोड़ देता है  तु हर पल मन बुलाता है  तु गावों की गंगा है  तुझे पूजा तुझे माना तुझे बरसों निहारा है  फकत एक बात मन में है  तु रमन धूलि है गावों की  जहाँ मैं छोड़कर आया  जहाँ तक दूर जाना है  तु घिरा है गगन पहाड़ों से  तु मेरी एक दुनियां है 

यादों के दीपदान

 वो यादों के दीपदान  हर बार उजाला करते हैं  मन के अंदर है जो अँधेरा  उसे जला से जाते हैं वो बातों के दौर सुहाने  हर बार संवारा करते हैं  सांसो के अंदर मरते मन को  आस थमा से जाते हैं  वो ख्वाबों के अंतर्ध्यान  हर बार हौंसला देते हैं  जिद जो बची रही है मन में  द्वार खोल सी जाती है  सालों की वो खोज समर्पण  चमक रौशनी देते हैं  अदृश्य हुई जो मंजिल मन की  उससे दिखा से जाते हैं।  

तू मेरी पहचान है

 कर्तव्यों में भी कर्मों में भी  साथ तेरी यादों का  है  चलता है खामोश सदा  ये द्वन्द मेरी पहचान है  होती कहाँ आशाएं जग में  हर अजनबी हर छोर हैं  कोई अपना मन बांधे है  ये टक मेरी पहचान है  खुशियों में भी दर्दों में भी  साथ तेरी बातों का  रहता है जो दूर सदा  ये फ़ासला मेरी पहचान है  होते कहाँ सब स्वप्न पूरित  हर सुबह हर सफर में  कुछ अधूरे ही सदा  ये राह मेरी पहचान है  एक चीरता है मनन ये  हर रूप में हर साथ में  हो अकेला ये सफर गर  तू मेरी पहचान है 

सम्बन्ध है सतिता

तु मेरा एक वो रिश्ता  जो बन्धन है पतिता का हजारों बार मैं हारूं समर में शेष जीवन का तु मेरा एक वो साया जो सम्बन्ध है सतिता का हजारों बार हूँ पत्थर अमर मैं तेरी ठोकर का तु मेरा एक वो नाता जो निभाना है सतता का हजारों बार मैं उजङु बहाव तेरे किनारों का तु मेरी एक वो मंजिल जो प्रमाण हो मेरे होने का हो अदृश्य मनन मन का तु खण्डहर मेरे बजूदों का  तु मेरा एक वो सपना जो देखा है जगता का हों आखें बन्द जब मेरी तु सपना हो हकिकत का

तेरे नाम

 ये सच जानता हूँ मैं  जो तु कहता है अब मुझसे  मैं तिल तिल यूँ ही जिया हूँ   जानता हूँ तुझे जरूरत नहीं मेरी  ये अहसास है मुझको  जो तु जता जाता है अब मुझसे  मैं पल पल यूँही गिनता हूँ  जानता हूँ तुझे कदर नहीं मेरी  ये पता भी है मुझको  जो तु कह गया अब मुझसे  मैं क्षण क्षण यूँ ही रोता हूँ  जानता हूँ तुझे परवाह नहीं मेरी  ये पता भी है मुझको  ये जन्मों का नहीं नाता  मगर मैं  साल जीवन के  तेरे ही नाम कर आया 

गुस्सा नहीं हूँ

 कभी तो सरहदें अपनी  तु होता लाँघ कर जाता  कभी ख़ाली से पन्नो पर  हमारा नाम लिख जाता  कभी तो बंदिशें अपनी  तु होता तोड़ कर आता  कभी जीवन के आपा में  हमारा हाल ले पाता  कभी तो सीमाएं अपनी  तु होता छोड़ कर आता  कभी होता वो गुस्सा तो  कभी हमको मना पाता  कभी तो जोड़ता मन को  कभी विखराव ठहराता  कभी सहता ये नादानी  कभी बाँहों में भर लेता  वो चुप रहकर जताना क्या  वो दूरी का आलिंगन क्या  वो रूखे से दो शब्दों को  कभी अपना मान कर कहता  मैं आहत हूँ परेशां हूँ  मगर गुस्सा नहीं तुझसे  निभाकर भी अकेला हूँ  कभी दो लब्ज़ कह देना  कभी लिखना वो हाल-ए-दिल  कभी कहना वो राज-ए-दिल  कभी तो पूछना खुद से  कि तुम्हारा हाल कैसा है ?

मुझे तेरी जरूरत है

 तु दुनिया के थपेड़ों से  परस्पर जूझ आया है  एकाकी ही रहा बरसों  खुद को खूब संभाला है  यूँ ढलती ही रही शामें  वो हल्की सी कोई रेखा  छोटी सी मेरी दुनियां  मुझे तेरी जरूरत है  तु अपनों के लिए हरदम  बराबर पर डटा पाया  जीवन जीना कोई तेरा  खुद को ढाल आया है  यूँ कुछ पल की बची रातें  वो अधूरे से कोई सपने  आधी हे मेरी दुनियां  मुझे तेरी जरूरत है  तु ग़मों को झेल आया है  सहजता से निभा पाया  समर्पित वो जवानी है  इच्छाएं मार आया है  यूँ कुछ खोता रहा हर पल  एक बार खुद को पाना है  आधा है मेरा रिश्ता  मुझे तेरी जरूरत है 

होगा ये कैसे

 वो हाथों के छाले  जिम्मेदारियों के पहलू  थकी सी आखों में  प्रीत दबाये वो सांसें  त्याग परिश्रम सब  समझा है हमने ये सम्मान घट जाये  तो होगा ये कैसे ?  वो बातों में ठहराव  त्याग परस्पर जीवन भर  कठिन रही उन राहों में  साथ देती वो बाहें संकल्प सिद्धि कोमलता सब  अहसास किया हमने  ये स्नेह घट जाये  तो होगा ये कैसे ? जीवन की एक जरूरत  जो रुक न पाए लम्बा  दूर चमकते चंदा  सागर मिलती नदियां  शांत सरोवर जीवन  संग में पाया हमने  ये जीवन  बिन तेरे  तो होगा ये कैसे ?