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गुमनाम ही रह जाते हैं

लिखा तो सब कुछ था  कागजों में न नज़र आया  मुक्कदर में कुछ रेखाएं  खोने के लिए भी होती है  पढ़ा तो सब कुछ था  परीक्षा में न काम आया  किताबो  के कुछ पन्ने खाली भी रह जाते हैं माना तो सब कुछ था  अपनों में न गिना पाया  मनों के कुछ रिश्ते  गुमनाम ही रह जाते हैं 

तू लगे

बढ़कर रुकना है सबको  झुक जाना है एक दिन  जो कभी भी टूट जाऊ  बस जोड़ता पूल तू लगे  टूटकर गिरना है सबको  बिखर जाना है एक दिन  जो कहीं भी मिलूं धरा पर  बस साथ आता तू लगे  छोड़कर जाना है सबको  जुदा हो जाना है एक दिन  जो कभी भी चलूँ जहां से  बस याद तू आते लगे 

स्नेह की पहचान

कोई ख्वाब जब अधूरा लगे  कोई राह जब कठिन दिखे  मंजिलों के शिखर से परे  मेरी खुशियों का अम्बार है  कोई रास्ता जब लम्बा लगे  कोई वन जब निर्जन लगे  शून्यता के शून्य से परे  मेरी कोशिशों की उड़ान है  कोई शब्द जब सुनाई न दे  कोई मंजिल अदृश्य लगे  पाने खोने से दूर कहीं  मेरे स्नेह की पहचान है 

ख्यालों के महल

न इठला रौशनी की  गली  मैं अपना चाँद छोड़ आया हूँ  आबाद तेरे शहर को करने  मैं अपना गांव छोड़ आया हूँ  न गुमां चंद रोज की धमक पर  मैं अखंड दीया छोड़ आया हूँ  तू चले जाने को धौंस समझता है  मैं बहती नदी छोड़ आया हूँ  न बना ख्यालों के महल  मैं बड़ी 'तिवारियाँ' छोड़ आया हूँ  तेरी ये बालकनियां खरीद न पाएंगी !  मैं पूरे पहाड़ छोड़ आया हूँ 

तेरी तरह

कभी सोचता हूँ तुझसे मिलकर तेरी सारी शिकायतें कर डालूँ छुप जाऊँ  तुझमे  कहीं और फिर मैं खो जाऊँ  कभी सोचता हूँ तुझे लिखकर  सारे अरमान कह डालूँ पत्थरो पर उकेरु कहीं  फिर कलम तोड़ डालूँ  कभी सोचता हो तुझे भूलकर  दुनिया वीरान कर जाऊँ  आस के बीज बोयूं  और तेरी तरह भूल जाऊँ 

तु नादां

पहले तो सादगी ने लुभाया हमें  फिर सच से चेहरे यूँ बहकाया हमें स्नेह का रोग मन  को न था एक नादां ने अब ये सिखाया हमें  पहले नज़रें झुकाकर बुलाया हमें  फिर दोस्तों की जहालत बनाया हमें सच से जीने का हुनर तो पता था हमें झूठ को पर लगाना  सिखाया हमें  पहले अंजान अपनापन दिखाया हमें  फिर दूरियों को परिभाषित कराया हमें साथ रहने की क़समें न खायी मगर साथ रहना अकेले में सिखाया हमें 

मानता कब है

कश्तियाँ बहा ले गए वो तूफां और थे  गरज गए जो बदरा वो बरसते कब हैं लौटकर आना पड़े समुन्दर की सीमा है  वरना पंछी को उड़ने की मनाही कब है तोड़कर बंदिशें आसमा में फ़ैल सकता है  संस्कारो में खड़ा पेड़ खुला बादल कब है  अपना हो नहीं सकता वो अपना लगता क्यूँ है  मन जानता सब है पर मानता कब है 

जब भी लगा

सहरा से निर्जन विस्तार पर यूँ लगा कमल सा खिल आया दो शब्द किसी ने लिख भेजे जब भी लगा वो भूल गया  पहाड़ों की शीतल चोटी पर  यूँ लगा तरूण मृग चल आया ऑंखों की पलकी झपकी है  जब भी लगा वो भूल गया  जंगल की घनी झाड़ियों से यूँ लगा पंछी कोई उड़ आया साँस की जिजीविषा लौटी है जब भी लगा वो भूल गया 

याद आयेगा

कभी अन्जान राहों का बटोही याद आयेगा कहीं ठुकरा दिया कोई वो पत्थर याद आयेगा ज़माने भर में घूमोगे वो मंज़र याद आयेगा कही कोने में सीमटा वो फसाना याद आयेगा  कही चुपचाप ढलता सा वो सूरज याद आयेगा  कहीं बदला मुडा कोई कदम फिर डगमगायेगा  बजार-ओ भर में घूमोगे वो ख़ालीपन सतायेगा कभी सूनसान राहों पर वो दस्तक याद आयेगा  कही टूटे मकामों का वो खंडहर याद आयेगा  कहीं सूने पड़े मन का बबंडर याद आयेगा  थककर हार बैठोगे निगाहों को भरम होगा  कभी गुमनाम क़दमों का वो चेहरा याद आयेगा 

अक्सर

ये सोचा कब था कि साथ हो  सामानांतर बह जाने कि ख्वाइशें अक्सर डुबो ही देती हैं उफनती नदी के वेग में  ये कब था कि पूजी जाय हर मूर्ति  पत्थरों को बोलते हुए देखने कि ख्वाइशें  अक्सर पत्थर बना ही देती हैं  भावनाओं के उदगार में  ये कब था कि पा लूँ सब कुछ  एकतरफा त्याग अपनाने की ख्वाइशें  अक्सर वैरागी बना ही देती हैं  समर्पण के सदभाव में