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अथाह प्रेम

 वो कहता है वो साथ मेरे  वो पास मेरे अहसासों में  मिले सफर के मोड आखिरी  मजिल मेरी तुझ तक है  मैं चादर फैलाऊँ जितना  ढांप लूँ तन मन जीवन सब  दूर रहे या पास रहे तु अपनापन बस तुझ तक है  वो कहता है गए ऐसा हो  वो साथ में मेरे चल निकले  राह बनायीं नयी नहीं जो  ख्वाब हमारे तुझतक हैं मैं अथाह प्रेम की सीमा तक  रंग दूँ यह जीवन वृतांत सब  मिल जाये या खो जाये तु  जीवन समर बस तुझ तक है

आलिंगन सिन्दूरी हो

 मैं कह बैठा वो कठिन बात  मन गांठ बैठाये बरसों थी  आ आलिंगन सिन्दूरी हो  मैं बांध लूँ तुझसे मन डोर प्रिये  कब जाने जाती साँस लगे  कब बातें भी दुश्वारी हो  एक तुझमें खो लूँ तन मन सब  मैं थाम लूँ तेरा हाथ प्रिये  परिभाषा कब  गढ़ पाया हूँ  इस रिश्ते की बुनियादों का  एक जोड़ दूँ रिश्ता प्राणों तक  मैं रंग लूँ तेरे रंग प्रिये  कब चाहा सब सम्पूर्ण लगे  कब चाहा जीत लूँ जग सारा  एक टिस सी मन रखनी है  मैं जी लूँ जीवन नाम तेरे 

तु मंजिल है

 मिलना जुलना तो यूँ नहीं होगा  उम्रभर साथ यूँ जरूरी है  मैं नदी हूँ एक बहती सी  तु समुन्दर सा ठहरना तो जरा  बात बातों में बात कब होगी  तेरे कुछ अस्क तो जरूरी हैं मैं आईना हूँ सूनेपन का  तु कभी सज के निखरना तो सही   तु चला आये यूँ समय तो नहीं होगा  खुशबू का वो झौंका  तो जरूरी है मैं तलाश हूँ अधूरे सफरों के  तु मंजिल बनकर मिलना तो सही 

कोई हिकमत है

 हिमालय छूँ के लौटा हूँ  समुन्दर एक सपना है  न बादल थे कभी मेरे  न लहरें साथ मिलनी है  ये तन्हा है सफर लम्बा  तु कुछ पल साथ में रहना  सालों मन में रखा है  जुबान पर लौट आया है  मन का एक निश्चय है  कलम की कोई हिकमत है रुकेगा कुछ समय लम्बा  तु कुछ पल साथ में चलना  आखों में जो हरपल है  सांसे बंद हो तुझपर  जिसे पाकर जमाना  है  जिसे खोकर सिफर जीवन  जमना है तेरे तीरे तु कुछ पल साथ में बहना 

कलश

भरदू रौं कलश और जणदूं कलश आस कू कलश विश्वास कू कलश बोली भाषा कलश शब्द नप्ति कू कलश गढभाषा पछ्याण भौं भल्यार कू कलश भूणों से कलश, खौला व्यखल्यूं से कलश गीत जात्रा की, लिख्वारों की अज्यूल्यी कलश चमकूणु कलश धमकूणू कलश गरजुणु कलश और रौजुणु कलश सौजुणु कलश समल्योण्या कलश  सग्वौरो कलश और सम्मानौ कलश शुफल हो कलश और सफल हो कलश धै लगोन्दू, म्येरी त्येरी पछ्याण कू कलश

'बकवासें'

 हम राहों में चलकर ही  यूँहीं एक साथ आये हैं  हजारों हैं मगर इम्तिहान  हम जीतने तो नहीं आये  'कुछ भी' हैं ये 'बकवासें' जो तुझतक जोड़ती मुझको  हजारों हैं मगर सपने  सब सच तो नहीं होंगे  मीलों का सफर मेरा  न होंगी ख़त्म उम्मीदें  सागर से हिमालय तक  सब अपने साथ कब होंगे  ऊचें से कुछ मचानों पर  बना है ख्वाब जीवन का  न गिर कर जी सकूंगा मैं  न अकेले चल सकूंगा मैं  जो है कुछ पास अब मेरे  वोही काफी है जीवन का  न सपने पाके जी पाया   न खोकर जी सकूंगा मैं 

मिलकर तुझसे

 मिल जाना जीवन राहों में  तुझ बिन कोई आस नहीं है  चला पार हूँ सागर करने  नांव उतारे चाप चलाते मैं केवट एक राह निहारे  कब आवोगे पालनहारे  चला बढ़ा हूँ राह अजनबी  मंजिल बिन एक साथ तुम्हारे  सूत्र मनों के बांधें हैं जो  कुछ हैं सूत्र पहनने बाकि  रिश्तों में रंग कौन तलाशे  तेरे रंग में भीग छपकते  मिल जाना जीवन राहों में  तुझ बिन कोई जीवन कैसा   कदम कहाँ अब मुड़ पायेंगें  मिलना खोना संगम तेरे  तु सागर मत्था फिर दोहराता  नदी हिमालय बढ़ आयी है  पाना जीवन सत्य रहेगा  मिलकर तुझसे खो जाना है 

ये तय है

 वो घण्टों की बातों का निष्कर्ष एक ही है  कि भूले न भूलेंगे मनों के रिश्तें ये तय है  मंजिल मिले न मिले  ये अलग बात है  रास्तों के सफर साथ तय होंगे ये तय है  वो रूठना मानना चलना ही है सतत  मनों में बसने वाले दूर न होंगे ये तय है  रिश्तों को नाम मिले न मिले ये और है  रे मन तु पास है  सबसे  ये तय है  कल क्या होगा ये सोच अब आती नहीं   ये खुशियां जीवन संग रहनी है ये तय है  बारिश में भीगे न भीगे ये अलग बात है भावनाओं का समुन्दर उमड़ेगा ये तय है 

नसीबों का खेल

 वो जो अपना है  सदा अराअरी में रहा  भावनाओं का कोई मोल नहीं  वो औरों की तीमारदारी में रहा  वो जो चितचोर है  सदा मुसाफिरी में रहा  शाम से पावड़े बिछाये हैं  वो औरों की टहलबाजी में रहा  वो जो पराया है  सदा अपनों में ही रहा  बरसों सजाते रहे सपने जिनके  वो हमको हर बार बस आजमाता रहा  ये नसीबों का ही खेल है  सदा आधा अधूरा ही रहा  किसी को नसीबों से मिला वो शख्स  जिसे मैं  हाथों की रेखाओ में ढूंढ़ता रहा 

रेखाएं भाग्यों की

 इधर भी जोर लगता है  उधर भी जोर लगता है  ये रेखाएं हैं भाग्यों की  ठहरती कब हैं संग अपने  धड़कती हैं मचलती है  ख़ामोशी में बढ़ती हैं  कैसे हो गिनती यादों की  सांसे कब हैं संग अपने  मिलता है बिछड़ता है  अपनाता रूठ जाता है  ये रिश्ते भी मनों के हैं  कहाँ चलते हैं संग अपने  योजन है आकांक्षा है  अभिलाषा समर्पण की  लाखों ख्वाब आँखों में  हकीकत कब है संग अपने  कभी पाना कभी खोना  जो ठहरा है वही क्षण है   ये रेखाएं हैं भाग्यों की  ठहरती कब हैं संग अपने